भाग ६९
नदी में आई प्रलयंकारी बाढ़ की विनाशलीला के बाद नदी के तटों पर इकठ्ठा हुई उपजाऊ मिट्टी फसलों के लिए वरदान साबित होती हैं वैसे ही कभी-कभी जीवन में घटी दुर्घटना अनजाने में ही मानवीय विकास की नई राहों की तरफ इन्सान का मुख मोड़ देती हैं।
मित्र-मण्डली के जीवन में घटित दर्दनाक दुर्घटना ने उनके अभिभावकों को जीने का नया मन्त्र दे दिया था। आम आदमी के दर्द को उन्होंने नजदीक से देखा और जिया। जन-जन की समस्या को समझा और उसी के समाधान की दिशा में वो काम करने लगे। वक्त ने उन्हें अँधेरी गुफ़ा में धकेल दिया था लेकिन उसी अँधेरे में उन्हें समाज कल्याण की नई राहों के दर्शन हुएं। अप्पा का यह हॉस्पिटल का 'ड्रीम प्रोजेक्ट' उसी का नतीजा था। अप्पा राजनीति के खिलाडी थे। उनका राजनीति पेशा नहीं जन-कल्याण का मन्त्र था।
भूमिपूजन की सारी तैयारी हो चुकी थी। अप्पा ने जन-जन को अपने सपने का हिस्सा बनाया था। काम आसान नहीं था लेकिन नेक-नीयत के कारण इस सपने को हकीकत में बदलना आसान हो गया था। नीली छतरीवाला भी उनपर मेहरबान था क्योंकि इसके पीछे स्वार्थ नहीं परोपकार की नेक भावना थी।
विभा ने भी जो कार्य अपने हिस्से लिया था उसे मित्र-मण्डली की सहायता से अच्छी तरह से सम्पन्न किया था। बूंद-बूंद से सागर बनता हैं, गिलहरी के योगदान से रामसेतु बन सकता हैं तो फिर आम आदमी के छोटे-छोटे योगदान से अस्पताल क्यों नहीं? विभा ने गागर में सागर भर दिया था...आम आदमी के सहयोग से!
वज्र और यश ने एक 'ट्रेवलर' बुक कर दी थी। मुम्बई से सभी साथ में ही कराड जाने वाले थे। पुणे से आबा, प्रतिभा जी और लक्ष्मी जी सीधे कराड पहुँचने वाले थे। अप्पा ने बाहर से आनेवाले मेहमानों की व्यवस्था हॉटेल में कर दी थी। बाकी सभी हितचिंतकों तथा स्नेहिजनों की व्यवस्था एक मंगल कार्यालय में कर दी थी। कराडवासी अप्पा के प्रयासों से बहुत खुश थे। आसपास के गावों के लिए कराड बड़ा बाज़ार था जो कई गावों से जुड़ा था। कराड विद्यानगरी तो पहले ही बन चूका था अब वह स्वास्थ्य सेवाओं के लिए भी जाना जायेगा इस कल्पना से ही सभी अभिभूत थे। किसी अभियान को जब आम जनता हाथों-हाथ लेती हैं तो उस काम को पूर्णता की तरफ ले जाना आसान हो जाता हैं।
अप्पा की आदत थी वह कभी काम से समझौता नहीं करते थे। जो उन्होंने मन में ठान लिया उसे सम्पन्न किए बगैर वो चैन से नहीं बैठेंगे यह कराड के लोग अपने पूर्वानुभव से जानते थे। अप्पा को सभी ने अपने आने की सूचना दे दी थी ताकि उन्हें व्यवस्था करने में कठिनाई न आएं।
कार्यक्रम सुबह ग्यारह बजे था। सभी मुम्बई से रात को साढ़े बारह बजे भोजन वगैरा निपट कर निकलने वाले थे। कराड जाने का रास्ता दो घाट से होकर गुजरता था। गाड़ी और ड्राइवर अनुभवी होना बहुत जरुरी था। बड़ी गाड़ी इसीलिए की थी कि कोई कुछ वक़्त के लिए आराम करना चाहे तो कर सकें। वज्र और यश ने सभी पहलुओं पर विचार कर रात को निकलने का तय किया था। रात को रास्ते पर वाहनों की भीड़ भी कम होगी यही सोच कर सब ने रात को निकलने का निश्चित किया था।
छोटू और अन्नपूर्णा ने सब के लिए चाय-पानी-नाश्ता पैक कर दिया था। सभी तय समय पर कराड जाने के लिए रवाना हुएं। गाड़ी में विभा, लाली, यश, प्रताप सिंह जी, कमला जी, जानकी जी, वैदेही और वज्र मिला कर आठ सवारी थी और ड्राइवर। गाड़ी नई थी और अच्छी स्थिति में थी। विघ्नहर्ता के जयकारे से सफ़र की शुरुआत हुई। ठण्डी हवा से बचने के लिए गाड़ी की खिड़कियां बन्द कर दी गई थी और AC शुरू कर दिया गया था। सभी नींद से बचने के लिए अंताक्षरी खेलने लगे। विभा बोल पड़ी, " ऑन्टी! आप की तरफ के लोग आपकी पार्टी में और मेरी तरफ के मेरी पार्टी में। जो पार्टी हारेगी, वह सब को ठण्डा पिलायेंगे। सभी ने 'हाँ' में स्वीकारोक्ति दी और शुरू हो गई अंताक्षरी!
विभा बोल पडी , " बैठे बैठे क्या करें? करना हैं कुछ काम, शुरू करों अंताक्षरी, लेकर प्रभु का नाम!"
'म' से बोलो यश! अब यश, वैदेही, जानकी जी, लाली एक टीम में और बाकी सभी विभा की टीम में!
तभी यश बोल पड़ा, " मेरा नाम राजू...घराना अनाम, बहती हैं गंगा, जहाँ मेरा गाँव... यश 'व' पर रुक गया..
अब वज्र बोल पड़ा, "वो पास रहे या दूर रहे, नज़रों में समाए रहते हैं, इतना तो बता दो कोई हमें, क्या प्यार इसी को कहते हैं?... 'ह' पर बोलो..जल्दी..
तभी जानकी जी बोल पड़ी, " हमें तो लूट लिया मिल के हुस्न वालों ने... गोरे-गोरे गालों ने.. काले-काले बालों ने... तभी विभा बोल पड़ी..."काले-काले गालों ने ऑन्टी..गोरे-गोरे बालों ने..." सभी हँसने लगे...
विभा बोल पड़ी, " अरे अपने पर हैं 'न'...जल्दी.. कमला ऑन्टी.. जल्दी... कमला जी बोल पड़ी..." न जाओ सैय्या.. चुरा के बइया... कसम तुम्हारी... मैं रो पड़ूँगी.. रो पड़ूँगी!"
सभी प्रताप सिंह जी के पीछे पड गए...अगली बार आपको जवाब देना पड़ेगा अंकल... सभी ने तालियाँ बजाई!
'ग' पर बोलो... तभी वैदेही बोल पड़ी, " गाए जा गीत मिलन के, तू अपनी लगन के... सजन घर जाना हैं...
'ह' पर अंकल.. जल्दी... जल्दी!
अब प्रताप सिंह जी भी पुरे जोश में आ गए थे।
"हर किसी को नहीं मिलता यहाँ प्यार ज़िन्दगी में.....'म' से... अब अंताक्षरी सपने चरम पर थी।
नए-पुराने सभी गीतों के खजाने के दरवाजे खुल चुके थे। अब जब याददाश्त कमजोर पड़ने लगी, गीतों का भंडार कम पड़ने लगा तो बहाने भी नए-नए सामने आने लगे।
सभी ने ढाबे पर चाय पीने की इच्छा जाहिर की। ड्राइवर भी कुछ-कुछ थक चूका था। उसे नींद न आएं यह जरुरी था। मुम्बई-पुणे के बिच का घाट तो पार हो चूका था। बाहर निकलते ही झींगुरों की आवाज़ ने सबका स्वागत किया था। ठण्डी हवाएं सब की जुल्फों से छेड़खानी करने लगी थी। पेड़ों की पत्तियाँ हवा के साथ झूल कर अपनी खुशियों का इजहाऱ कर रही थी।
सभी वॉशरूम हो कर आएं और चाय के साथ अपनी पसंद के बिस्कुट खा कर फिर सवार हो गए अपनी 'ट्रेवलर' गाड़ी में! अब दूसरे घाट का इंतज़ार था। रात का समय था। तेज रोशनी के बिच गाड़ी का संतुलन बना कर आगे बढ़ना आसान नहीं था। सब थक चुके थे। सभी ने कुछ आराम करने का मन बना लिया था। आगे ड्राइवर के पास की सीट पर प्रताप सिंह जी बैठे थे। अमेरिका जाने के बाद उनका दिन-रात का तालमेल बदल गया था। यह अच्छी बात थी कि उन्हें नींद नहीं आ रही थी। ड्राइवर को नींद न आएं यह जिम्मेदारी उन्हें दी गई थी। कुछ ही समय बाद ड्राइवर ने दूसरा घाट भी सफलतापूर्वक पार कर दिया था।
अब आसमान में चमकते सितारें धीरे-धीरे लुप्त होने लगे थे। प्राची की मुस्कुराहट में भोर की लालिमा छुपी हुई थी। सभी को भोर का इंतज़ार था। अप्पा ने हॉटेल का पता तथा मैप भेज दिया था। सुबह की सुगबुगाहट के साथ ही सभी हॉटेल पहुँच गए थे। अप्पा ने सबको मिला कर तीन रूम आंबटीत कर दिए थे। एक बड़ी रूम में विभा, वैदेही, लाली, जानकी जी, एक में यश के मम्मी-पापा और एक में यश और वज्र। कार्यक्रम सुबह ग्यारह बजे था। तब तक उन्हें आराम मिले इसीलिए उन्हें सीधा हॉटेल में ही भेजा गया था। नाश्ते के लिए उन्हें साढ़े नौ बजे डाइनिंग हॉल में आना था।
सभी अपने-अपने कमरे में चले गए आराम करने ताकि कार्यक्रम में तरोंताज़ा हो कर पहुँच सकें। आबा के भी घण्टे भर में पहुँचने की उम्मीद थी। अप्पा ने सबकी अच्छी व्यवस्था की थी। सेवा देने के लिए होटल में कर्मचारी भी मौजूद थे। सभी को भूमिपूजन कार्यक्रम का इंतज़ार था। एक सपना कल्पना लोक से उतर कर वास्तविकता के खुरदरे धरातल पर हकीकत का जामा पहनने को उतावला हो रहा था।
स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।
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