ये प्यार ही तो ज़िन्दगी... भाग २४
भाग २४

बाबा की सभी रिपोर्ट्स देख आबा ही नहीं डॉक्टर भी आश्चर्यचकित थे! एक तरफ जहाँ युवा पीढ़ी अलग-अलग बीमारियों से ग्रसित हो रही थी वहीं दूसरी तरफ बाबा जैसे बूढ़ी हड्डियों वाले बुजुर्ग डॉक्टर को अचंभित कर रहें थे! 
गांव की स्वच्छ, खुली हवा में पले-बढ़े, अस्सी बसंत देख चुके बाबा अपने काम आज भी स्वयं करते थे! साफ़ दिल, परोपकारी वृत्ति और द्वेषरहित व्यवहार था उनका तो फिर किस बात का होगा तनाव? जो दिल में वहीं अधरों पर फिर क्यों होगा किसी से वैर-विरोध? न मेहनत से डरते थे न किसी की धमकियों से! स्पष्ट वक्ता होने की वजह से कभी-कभी 'आ बैल मुझे मार' जरूर करते थे मगर उनका पारदर्शी मन सामनेवाले को जरूर पुन: विचार करने के लिए मजबूर कर देता था! मेहनत-मशक्कत से गठित शरीर आज भी बुढ़ापे की समस्याओं का डट कर सामना करने में सक्षम था! बाबा की घर वापसी सुनिश्चित हो गई थी और घर का आँगन सूर्य-किरणों से प्रफुल्लित जूही- चमेली के फूलों से महक रहा था! वज्र कॉलेज जा चूका था और आजी-आई, आबा और बाबा के आगमन का इंतज़ार कर रहें थे! 
अपनी SUV गाड़ी का हॉर्न सुन प्रमिला जी बाहर आ गई.. बाबा धीरे-धीरे घर की ऒर बढ़ रहें थे.. प्रमिला जी ने मुख्य द्वार पर ससुर जी की आरती उतार उन्हें सुन्दर गुलाब के फूलों से बना गुलदस्ता दिया और कहा, ' सुस्वागतम् बाबा! जन्मदिवसाच्या खूब-खूब शुभेच्छा! पाया पड़ते बाबा! " बाबा भावुक हो गएँ... "औक्षवंत हो! सदैव अशीच हसत रहा पोरी" आजी बहुत आनंदित थी! आबा के साथ-साथ आज वह भी मुस्कुरा रही थी मानों गमले में खिला गुलाब! प्रवेश करते ही बाबा ने पहला सवाल किया, " वज्र कुठे आहे? कॉलेज ला गेला आहे? केव्हा येणार? " आबा के जबाब देने के बाद प्रमिला जी और आजी अपने कमरे में आराम करने चले गएँ! 
चाय-नाश्ता हो चूका था और प्रमिला जी रसोईघर में भोजन की तैयारी में जुट गई! अन्नपूर्णा को उन्होंने सभी के लिए कम घी-तेल-मिर्च का इस्तेमाल करने को कहा था...साथ में थोडी लहसुन-मिर्च की चटनी भी बनाने को कहा!
अब 'झणझणीत-मसालेदार' खाना खाने के दिन लद चुके थे! सभी को खाने में परहेज रखना जरुरी था! आरामकुर्सी पर विश्राम करते-करते आबा की आँख लग गई थी मगर उनकी किस्मत में आराम शायद लिखा ही नहीं था! 'इंडो-नेपाल सांस्कृतिक समिति' के अध्यक्ष का फोन आया था! उन्होंने विनय के माता-पिता से बात कर उनकी 18 जनवरी की हवाई यात्रा की टिकटस बुक करा दी थी..आबा ने उनका शुक्रिया किया और वो फिर आँखें बंद कर तनाव रहित होने की कोशिश करने लगे तभी फाटक की आवाज़ सुन वह द्वार की ऒर देखने लगे.. वज्र को अंदर आते देख वह फूले न समाएं! वज्र नें भी आते ही आबा के पैर छुएँ और आबा बोल पड़े,' पोरा! बाबा नां घरी आणलय बरं का... तुझीचं वाट पहात आहेत ते... वज्र हाथ-पैर धो कर सीधा बाबा को मिलने चला गया! पानी भी वज्र ने वहाँ जा कर पिया.. बाबा पलंग पर लेटे हुए थे.. वज्र की आहट पाते ही उन्होंने हाथ उठाया और वज्र को पास आने को कहा! वज्र नें उनको चरणस्पर्श किया और उन्हें जन्मदिन की ढेरों बधाईयाँ दी! वज्र उनके लिए एक मलमल का कशीदाकारी किया हुआ कुर्ता और पायजामा लेकर आया था जो उसने वैदेही से मंगवाया था.. वैदेही की पसंद सभी को बहुत अच्छी लगी...बाबा भी बहुत खुश हुएं.. इस बात से नहीं कि वज्र उनके लिए कुर्ता-पायजामा लेकर आया बल्कि इसलिए कि उसे बाबा का जन्मदिन याद था! 
दादा-पोते का प्यार देख प्रमिला जी अक्सर रश्क करती थी! विरले ही होते हैं जिन्हें बुजुर्गों का दिल खोलकर प्यार मिलता हैं.. न जाने किस जनम से दिल के तार जुड़े थे दादा-पोते के! 
बहुत दिनों बाद पुरे परिवार नें डाइनिंग टेबल पर एक साथ भोजन किया...आज के धूमिल परिवेश में एक खुशहाल संयुक्त परिवार को देख आबा और प्रमिला जी बहुत आनंदित थे! जीवन के उतार-चढाव में एक-दूसरे की शक्ति बने परिजनों को देख कौन फूले नहीं समायेगा? आपस में प्रेम हो तो सयुंक्त परिवार एक वरदान बन जाता हैं, यह जानते थे आबा! किस्मतवाले थे आबा कि उन्हें गृहलक्ष्मी भी वैसी ही मिली जो सारे परिवार को साथ लेकर चलने में, बड़ों का सम्मान करने में विश्वास करती थी! जीवन के पैतीस बसंत-शिशिर साथ-साथ देखने के बाद भी कभी एक-दूजे से न कोई शिकायत, न गिला! प्रमिला जी का पीहर पास के ही गाँव में था पर न कभी पीहर की ससुराल से तुलना न कभी पीहर का बेजा स्तुति-गान! एक-दूजे में अपार विश्वास, प्रेम.. यहीं तो थी उनके सफल दाम्पत्य जीवन की नींव!
भोजन करते-करते बाबा आबा की तरफ देख बोल पड़े, " उद्या निघू का आम्ही सासवड ला? काय म्हणते पोरी? "
आई-बाबा का मन सासवड में ही लगता था मुम्बई उन्हें सराय सा लगता! आने की भी जल्दी, जाने की भी जल्दी! पूरा जीवन सासवड में ही बिताया था उन्होंने! गाँव की मिट्टी में पले-बढ़े, फले-फूले और उसी मिट्टी में एकाकार होना चाहते थे वो! 
आबा ने कल जाने की बात कह कर विषय को विराम दिया और वह कुछ समय आराम कर ऑफिस चले गए...
आज वज्र के यहाँ नुक्कड़ नाटक की प्रैक्टिस के लिए सब आने वाले थे! वज्र ने माँ को खाना खाते हुए कह दिया था कि यश, विभा और वैदेही आज चार बजे प्रैक्टिस के लिए आयेंगे! सभी बहुत खुश हुएं, बाबा सब से ज्यादा! उन्हें मेहमाननवाजी का बड़ा शौक था! चार लोग घर में नहीं दिखाई देते तो सुना-सुना घर उन्हें खाने को उठता! 
यश ने विभा और वैदेही से बात की और उसने चार बजे वज्र के यहाँ पहुँचने का भरोसा दिया! विभा और वैदेही को एक काम दिया गया था और वो दोनों पहले ही निकल कर अपना काम पूरा कर वज्र के यहाँ पहुँचने वाली थी! तय समय पर यश, विभा और वैदेही वज्र के यहाँ पहुँच चुके थे! प्रमिला जी नें उनका स्वागत किया और वो तीनों दीवानखाने में बैठ वज्र का इंतज़ार कर ही रहें थी कि वज्र ने आकार तीनों को चौका दिया! वज्र आज सूट-बूट में तैयार हो कर बैठा था.. डॉक्टर का किरदार जो निभाना था!
वैदेही उसे देखते ही रह गई! कितना आकर्षक था उसका व्यक्तित्व! चेहरे का तेज ही बता देता था कि वह एक प्रतिभा सम्पन्न शख्शियत हैं! सभी से गले मिल कर वह उन्हें आजी-बाबा  के कमरे में ले गया! कब से विभा कुछ छिपाने की कोशिश कर रही थी! यश ने आगे बढ़ कर आजी-बाबा का आशीर्वाद लिया और वैदेही-विभा ने भी चरणस्पर्श कर ढेरों दुआएं ली! वज्र ने भी उनके पैर छुएँ... अब यश, विभा और वैदेही ने छुपा कर रक्खे अपने-अपने पैकेट्स निकाले और तीनों ने साथ में ही बाबा को जन्मदिन की शुभकामनाएँ दी! यश नें फूलों का गुलदस्ता बाबा को दिया, तो वैदेही नें मिठाई का बॉक्स और विभा ने रेशमी पीताम्बर! वज्र भी अब साथ हो चूका था!  तभी आबा भी आ गए! छोटू, अन्नपूर्णा को भी प्रमिला जी नें आवाज़ दी! सभी मिलकर गाने लगे...
"बार-बार दिन ये आएं, बार-बार दिल ये गाएं,
तुम जियो हजारों साल, साल के दिन हो पचास हज़ार... हैप्पी बर्थडे टू बाबा..हैप्पी बर्थडे टू यू! "
और सभी नें तालियाँ बजा कर बाबा को अनन्त शुभकामनाएँ दी! बच्चों का उत्साह देख कर सभी गदगद हो गएँ! 
आबा ने सब के लिए सूजी का हलवा  बनाने को कहा! बाहर की मिठाई से घर का हलवा बेहतरीन पर्याय था! अन्नपूर्णा ने सबके लिए पूरी-भाजी बनाई और श्रीखंड तो फ्रीज में ला कर रक्खा हुआ ही था! 
बाबा बहुत अभिभूत थे! बिना किसी योजना और पूर्व सूचना से बाबा का 81 वा जन्मदिन पुरे उत्साह से मनाया जा चूका था! सभी के जीवन में घर चुकी कई दिनों की निराशा, तनाव को भूल चुके थे! पतझड़ के बाद खूंट से पेड़ पर चमकती कोंपलों सी खुशियाँ सभी को मोहित कर रही थी!
सभी आएं थे किसी और मक़सद से पर एक सामान्य घटना को उन्होंने खास बना दिया था! बाबा के जीवन में इस छोटे से जश्न का बहुत बड़ा महत्त्व था!
बुजुर्ग भी कितने भोले, सरल ह्रदय होते हैं न! जरा सी नमीं, जरासा प्यार उन्हें परमानन्द से ओतप्रोत कर देता हैं.. मानों दूध में घुली केसर! इत्ती सी खुशी, इत्ता सा प्यार, इत्ता सा सम्मान... और बदले में ढेरों दुआएं, आशीर्वाद!
विभा, वज्र, वैदेही और यश का ह्रदय आज अपार आनन्द से भर गया था ! अपने बुजुर्गों की आँखों में कृतज्ञता की चमक देख कौन भला हर्षित नहीं होगा? एक तरफ उन्होंने उम्र की ढलान पर अपने बुजुर्गों को हँसने-हँसाने का मौका दिया तो युवाओं को अपनी भावनाएँ , संवेदनाएं व्यक्त करने का सुनहरा अवसर! प्रमिला जी ख़ामोशी से सभी पलों को अपने मोबाइल में कैद कर रहीं थी क्योंकि आखिर भविष्य की अनमोल थाती उन्हें ही तो संभाल कर रखनी थी! 
सभी एक-दूसरे से बतिया रहें थे और भोजन का आनन्द लें रहें थे.. इस बीच आबा ने पास के कमरे में जा कर फ़ोन पर कुछ बात की और कुछ ही देर में उनका ड्राइवर कई गिफ्ट पैक लेकर आ गया! आबा ने उसे भी मिठाई खिलाई!
आबा ने टिफिन बॉक्स में सूजी का हलवा पैक कर वैदेही को दिया और चारों को रिटर्न गिफ्ट के रूप में चाँदी के सुन्दर दीये दिएँ ..मानों सभी के घर में उजाला हो यहीं आबा के परिवार की मंगलकामना थी...

स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई |
अगला भाग अगले अंक में....


इस पर लोग क्या कह रहे हैं
  • बहुत खूब.. दीप से दीप जलेंगे तो जीवन रोशन हो जायेगा! प्रेरणादायक सुन्दर प्रस्तुति!
  • बहुत सुन्दर प्रस्तुति 😍😍❤️😍😍