पानी-पानी हुई नारी,
देख संवेदनाहीन,
पुरुष मानस भारी।
क्या स्वतंत्रता यहीं?
पानी -पानी पुकारती,
पीड़िता कराह रही,
तड़पती राह पर।
क्या आत्मा जिन्दा रहीं?
पानी-पानी खेत सारे,
कभी बून्द तरसाए
कभी सूखे कभी ओले,
क्या आत्महत्या सहीं?
बून्द स्वाति की सीप में,
गिरी देखो आकाश से!
चढ़ा पानी मोती पर,
आभा हैं देखी कहीं?
स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।