गुरुदक्षिणा!
"बाई! माझं पोर लई द्वाड आहे! मायेच्या पदरा खाली घ्यालं का त्याला? लई उपकार होतील तुमचे!" एक माँ विनती कर रही थी और रमा अवाक खड़ी थी! उसने रघु की माँ के कंधे पर हाथ रख्खा और उसे सांत्वना दी! आँखों से बहते आंसुओं को थामना आसान नहीं था ...रमा ने कहा,' कल से शाम साढ़े सात बजे मेरे घर भेज देना!'
नगरसेवक के कार्यालय में बैठी रमा की आँखों के सामने अतीत की लड़ियाँ एक-एक कर खुल रही थी! 
वक़्त इंसान को कब, कैसे, किस मोड़ पर ला खड़ा करता है, कोई नहीं कह सकता! 
रमा के सामने ट्रे में कॉफ़ी और कुछ चिप्स थी! वह रघुनाथ की मेहमान नवाजी से अभिभूत थी! मन के उपवन में हिरण से भी तेज गति से वक़्त भाग रहा था! बारह साल पहले का प्रसंग मन के धुँधले फलक पर फिर से उभर आया था! 
रमा सामने लगी तस्वीरों को निहार रही थी! महात्मा गांधी, लालबहादुर शास्त्री की तस्वीरों के बीचो-बीच एक गद्देदार कुर्सी सजी थी! आफिस टेबल पर गणेश जी की छोटीसी मूर्ति विराजमान थी! यादों के पर्दे हवा के साथ-साथ हिलने लगे! यह तो वहीं मूर्ति है जिसे मैंने रघु को दसवीं में अच्छे प्रतिशत से पास होने पर भेंट दी थी! यादों के मयूरपंख मुस्कुराने लगे! कितना बदल गया था रघु! कहाँ कृश काया वाला मुरझाया सा रघु और कहाँ यह सोने से मढ़ा पहलवान सा मुस्कुराता रघुनाथ!  
तभी रघु ने केबिन में प्रवेश किया! मैं उठने की कोशिश कर रही थी मगर रघु ने मेरे चरण छुए और कहा,' मैडम जी! सॉरी! आपको वेट करना पड़ा! कहिए! कैसे आना हुआ? मुझे बुला लिया होता!'
रघुनाथ की बातों ने मुझे निःशब्द कर दिया था! आवाज़ की खनक ने यथार्थ के दरवाजे पर दस्तक दे दी थी! न जाने क्यों मेरी आँखें भर आई! शब्द बड़ी मुश्किल से होंठों से नाता तोड़ पा रहे थे। रमा ने रुंघे गले से कहा,"बेटा! सर जी बहुत बीमार है! डॉक्टर ने जल्द से जल्द आपरेशन के लिए कहा है! बिना घर को बेचे मैं पैसों का इंतजाम नहीं कर पाऊँगी और अड़ियल किरायेदार है कि घर खाली करने को तैयार ही नहीं है! न बारह महीनों से किराया दिया है न कहीं और जगह ढूंढ रहा है! मुझे ही केस करने की धमकी दे रहा है! कैसे करूँ मैं पैसों का इंतज़ाम?"
बहुत देर से रमा ने आंसुओं को रोक रक्खा था मगर वो भी अपनों की तरह धोका दे गए! रघु ने पलक झपकते ही टिशू पेपर आगे किया। रमा भी सम्भल गई। कितनी लाचार हो गयी हूँ मैं! वह मन-ही-मन खुद को धिक्कार रही थी।
तभी रघुनाथ ने आवाज़ दी! "गण्या! इकडे ये! मैडम जीं चा एड्रेस आणि भाड़ेकरु चा फ़ोन नम्बर लिहून घे लगेच!" और रमा की ओर मुड़ कर कहा,' आप चिंता न कीजिये! आपका काम हो जाएगा! जगह के बिकने तक पैसे का इंतज़ाम मैं कर दूंगा '
रमा अपने आप को संभालने की कोशिश कर रही थी मगर वो नाकाम थी! आंसुओं को उसकी इजाज़त की कहाँ जरूरत थी? उसने रुंघे गले से कहा,' तुम्हारा जो भी मेहनताना बनता है, मैं दे दूंगी!' बात खत्म भी नहीं हुई थी कि रघुनाथ जोर से हँस पड़ा! 'मैडम जी! आप के घर आकर पूरनपोली खानी है! अभी तक मैं भूल नहीं पाया हूँ आप के हाथों से बनी पूरनपोली का स्वाद! काम होते ही मैं आपको फ़ोन करूंगा! आपके घर आकर सर जी को भी मिलूंगा, आपके आशीर्वाद भी लूंगा और आपके हाथों से बनी पूरनपोली भी खाऊंगा!' 
रमा असमंज में थी ...उसकी खुद्दारी उसे दुत्कार रही थी! रमा की खामोशी को भांप कर रघुनाथ बोल पड़ा, 'मैड़म जी! टेंशन मत लेना! यह एहसान नहीं, 'गुरुदक्षिणा' है मेरी!
रमा जान गई थी! आदर्शों के तंदूर पर रोटियां सेंकी जा सकती है मगर फूलने के लिए तो उन्हें धगधगती आग पर ही डालना पड़ता है! 
 
 
 
 
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