सूझ बूझ!

विषय - सूझबूझ
विधा - लघुकथा 

बात बहुत पुरानी है,शादी के तीन महीने बाद मंगला मायके आती है,  जो शरीर -सौंदर्य मंगला का पहले था, वो अपेक्षाकृत आधा हो गया था, गुमसुम सी रहती थी मंगला।

मायके वाले कोसने लगे, " इतनी अच्छी  सास है, इतना अच्छा परिवार है, शादी के बाद तो चेहरा खिलता है, माॅं ,बहन-भाई, सारे एक सूर में क्या ससुराल में खाना कम दिया जाता है,ऐसा क्या बना दिया है अपने हुलिए को।इतने धनवान परिवार में ब्याहने के बाद भी ये हालत है। "

 मंगला नजरअंदाज करते हुए, "ठीक ही तो हूॅं, अलग शहर है, पानी सेट होने में समय तो लगता है" कहकर बात को कुछ छुपा रही थी।

मायके में किसी ने गहराई से नहीं सोचा कि मंगला का हुलिया ऐसा क्यों बना है, किसी का ध्यान नहीं गया । बस केवल दादी पार्वती ही घर में सूझ बूझ वाली थी, उसने मंगला को अपने कमरे में बुलाया और पूछा ससुराल में सब ठीक तो है? मंगला कीआँखों आंसू थे, दादी ने अपनी सूझ बूझ से सारी बातें उगलवाई।

दरसअल मंगला का पति लाईन में नहीं था,..दादी ने किसी को बताएं बगैर,अपनी सूझ बूझ का उपयोग किया,बात का बवंडर न कर दामाद जी को व्यक्तिगत रूप से ,ऐसा धमकाया या कहो कि ऐसा समझाया कि वो अभी तक राज ही है पर "सांप भी मरा, और लाठी भी नहीं टूटी"।

मंगला ससुराल जा चुकी थी। इस बार आयी तब बहुत खुश थी,पति रोमिल ने रोमियो गिरी छोड़ दी थी  और वो अब सीधी लाइन पर आ जो गया था ।

 स्वरचित: अशोक दोशी
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