विषय:अपनी अपनी सोच है
विधा :दोहे
अपनी अपनी सोच है, सबके अपने ध्येय।
कुछ प्यारे जन सोच से, लोग तुच्छ कुछ हेय ।
अपनी अपनी सोच है, सबका अपना काम।
रावण की भी सोच थी,सुमित सोच में राम।।
समझ सोच से छवि बने, रखना शुभ-शुभ सोच।
परिचायक ये चरित की, रखें सोच में लोच।।
सघन सोच का क्या करें, जिसमें रहें न सार।
खुदगर्जी हो सोच में ,पैदा करती खार।।
सोचो तो कुछ ढंग का, रहें न जिसमें वाद।
रहे सोच संतोष प्रद, तभी रहोगे याद।।
चिंतन चातुर्य संग रख, बन मत तू नादान।
बचकानी हो सोच तो, पाए कहीं न मान।।
निम्न सोच से यदि घिरे , जाती महँगी साख।
गयी साख तो क्या बचा,छवि हो जाती राख।।
स्वरचित अशोक दोशी