दोहा गीतिका!
शीर्षक : संयुक्त परिवार का महत्व
उंगलियाँ जब पाँच हो, बढ़ती परिजन आस।
एकता बनती ताकत , आती सबको रास ।।
आँधी आई सोच में, रिश्ते सारे गौण।
खण्ड-खण्ड अब हो गएँ, घर-परिजन उल्हास।
सहनशीलता की कमी, मतलब की ले आड़।
कहीं खूब धन-लालसा, कहीं स्वार्थ की प्यास।।
ईट-ईट अब धाम की, बिखर चुकी हैं आज।
अब कुटुंब-कबिला नहीं, बिखरा हैं विश्वास।
सब हिल-मिल कर भोगते, राज कुँवर सा थाट।
जहाँ संयुक्त भावना, सबसे उत्तम खास।।
सुख-दुख के थे सभी, साथी तब थी जीत,
इक-दूजे के संग थे, घर में रहा उजास।।
परिभाषा तुम जान लो, ढ़ाई आखर प्रेम।
भीगा अब जो प्रेम से, वह निवास हो पास।।
अनेकता में एकता, बना रहे सम्मान।
बहुजन हित में है खड़ा, उस घर लक्ष्मी वास।।
स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।