देखना होगा तुझे ये आख़री अन्जाम भी!
पीना होगा ज़िन्दगी का बचा-खुचा जाम भी।
समय की कुक्षी में क्या छुपा है क्या पता!
विधाता के रहमोंकरम का शुक्रिया तू जता।
जन्म लिया मनुज का, मनुज सा व्यवहार कर,
समता, करुणा,भाईचारा रत्न अंगीकार कर।
वक़्त की आँधियों में दरख़्त सा मत उखड़,
गहराईयों तक फैली जड़ों से जमीं रख पकड़।
सीना तान चल तू, उतार फेंक कषायों का भार,
विघ्न-जंजाल में फंस कर मान न अपनी हार।
अमावस्या से पूर्णिमा का सफ़र चलता जायेगा,
रजनी के गर्भ में आदित्य पलता सदा ही पायेगा।
ग्रहण भूल राही उजालों का सफ़र जारी रखना।
चंद पल का अँधेरा फिर स्वेद का फल चखना।
रिश्ते-नाते सगे-सम्बन्धी सफ़र में न देंगे साथ।
कौन जाने किस मोड़ तक थामे रक्खेंगे हाथ।
चरेवैति चरेवैति भले जीवन हो अंधियारी रात,
खुद में विश्वास जिन्हें अन्जाम तक पहुंचेगी बात।
स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।