अभिलाषा! कुंज-कुंज खिलने दो कलियाँ, सूरज से हो आँखें चार!
स्तनधारी के शिशु का हो, माँ के दूध पे पहला अधिकार!

धरती का सीना चीर, निहारता अंकूर सृष्टि-प्रवेशद्वार!
सांसों पे हो अपना राज, हो शुद्ध पवन, पानी, पौष्टिक आहार।


नाना-नानी, दादा-दादी, माता-पिता का मिले प्यार-दुलार, 
खेल-खिलौने, गुड्डे-गुड्डी, सखा-सहेली हो सपनों का आधार।

शिक्षा-दीक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा पर, हर बच्चें का अधिकार!
बस्तें, स्पर्धाएं, आकांक्षाएं, न कुचले मासूमों का संसार।

असमय न पड़े बच्चों के कोमल कंधों पर दुनियादारी का भार!
ईट के भट्ठे, दहकते अंगारे, जलते तंदूर न हो अभागों के यार।

बेरहम दुनिया के बाशिंदे, नित खेले खून की होली।
काश! बच्चों के सौदागर, लगा न पाएं मासूमों की बोली।

भले हर फूल की किस्मत का हो, अलग-अलग लिखाण,
कोई दरिंदा न लील ले, खिलने से पहले पंखुड़ी के प्राण।

आएगी बहारें, चहकेंगे परिंदे, खिलेंगे फूल, बहकेगा गुलिस्तान!
मुस्कुराएगी कायनात, महकेगी फिज़ा, महफूज रहेगा हिंदुस्तान!

स्वरचित तथा मौलिक
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।





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