रंग दो...
रंग दो ननदी मेरी सुनी सुनी हथेलियाँ 
मेहंदी से लिख दो प्रीत की पहेलियाँ!

टेसू के फूलों से रंग दो मेरी चुनरियाँ,
फूलों की पंखुड़ियों से सज़ा दो गालियाँ!

हल्दी-उबटन से महका दो अंग-अंग!
माँ भारती! लाल के लहूँ से रंग दो चुन्दड!
पहना दो माँ जी! अमर सुहागन का चुड़ा!
आशिशों के कुण्डल, सुहागन का जोड़ा!

अक्षत उछालो पिताजी, कर दो कन्यादान,
अस्त्र-शस्त्र श्रृंगार, सीमा-रक्षा-हित प्रयाण!
तव बेटे के बलिदान का करूँ मैं सम्मान!
झुकने न दूँ तिरंगा! अक्षुणं रखु आन-बान

रणबांकुरे की भार्या, माथे रक्तिम टिका,
दुश्मन के लहूँ से, सजाऊँगी बोर-टिका!
अमर शहीद की सुहागन, लिखूँगी गाथा,
उर्धवगामी सदा तिरंगा, उन्नत रहेगा माथा!

स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई, महाराष्ट्र!
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