ये प्यार ही तो ज़िन्दगी... भाग 5
भाग ५

सूरज की सुनहरी किरणों ने वैदेही के गालों को थपथपाया तब कहीं वैदेही आँखें मलते-मलते उठ कर बैठ गई! माँ! कहा हो तुम माँ..वह बोल पड़ी... रसोई घर से आती माँ को देख वैदेही बहुत खुश हुई..
कितने दिनों बाद माँ के हाथ के कांदा-पोहे की खुशबू से वह तृप्त हो गई! आखिर माँ के हाथ के बने व्यंजनों का स्वाद ही कुछ अलग होता हैं... पता नहीं कितना प्यार घोलती हैं वह उसमें मानों दूध में घुली मिश्री...और ऊपर से अदरक वाली चाय! व्हाट् अ डेडली कॉम्बिनेशन मॉम !

पल भर माँ उसे निहारती रही और दवाईयाँ उसे थमा कर वह फिर से रसोई में घुस गई...
वैदेही आँगन में घूमना चाहती थी मगर माँ ने उसे रोक रक्खा था! ज़ख्म ताज़ा थे और तेज हवाएं चल रही थी.. कहीं धूल-मिट्टी से इन्फेक्शन हो गया तो... उसने वैदेही को सिर्फ शीशे के पीछे खड़े रह कर बाहर का नजारा देखने की अनुमति दी थी 
...
आँगन का हरसिंगार का पौधा आज खुल कर हँस रहा था.. उसने मानों आँगन में वैदेही के स्वागत में सफ़ेद केसरी फूलों की कालिन बिछा दी थी...तुलसी अपनी डालियाँ हिला-हिला कर उसका अभिनन्दन कर रही थी तो पास का मोगरा श्वेत कलियों से घिरे गुच्छो के साथ सौरभ बिखेर रहा था! बादाम के पेड़ों पर मिट्टू बोल रहें थे, फलों को चख कर हुड़दंग मचा रहें थे...
अगले ही पल उसने देखा...पास के गुलाब के फूल पर होले से एक तितली आकर ठहर गई है ... उसके रंगबिरंगी पंखों ने उसकी यादों का ताज़ा कर दिया... 
उस रात गरबा में वह ऐसा ही इंद्रधनुषी चनिया-चोली पहन कर गई थी... उसे गोलाकार नाचते हुए देख कर वज्र बोल पड़ा था... ऐसे लग रहा मानों आसमान में कई इंद्रधनुष निकल आएं हैं... वैदेही! आज तो छा गई हो यार! तभी विनय ने झट से अपने मोबाइल से फोटो क्लीक किया..
वैदेही ने खिड़की के पर्दे खींचे और वह उठ कर धीरे-धीरे माँ के पास चली गई.. "माँ! मैं मदद करूँ तुम्हें? "
माँ मुस्कुराई! बेटा! पहले जल्दी-जल्दी ठीक हो जा... फिर तेरे हाथ की बनी भाकरी और पीठलं खाऊँगी... उसके पश्चात ही मुझे शान्ति मिलेगी "...तभी रिंग टोन सुनाई देने लगी..."बिछड़े सभी बारी..बारी...." यह तो मेरे फ़ोन की रिंग टोन है... उसने झट से फ़ोन उठाया... यश की माँ का फ़ोन था! वह बता रही थी कि यश का ऑपरेशन सफलतापूर्वक हो गया है... अभी 4-5 दिन हॉस्पिटल में ही रखेंगे उसे...तुम कैसी हो वैदेही? ठीक हूँ कह कर उसने फ़ोन पास खड़ी माँ को थमा दिया! यादों के परिंदे बार-बार नीले आसमान में उड़ान भरते और कुछ ही पल में  लौट कर आँगन में बाहें फैलाए खड़े नीम पर आकर सुस्ता जातें!
दोपहर का काम निपट कर माँ लेटी ही थी कि आबा का फ़ोन आया! "पोरी! कशी आहेस? वैदेही ला सांग.. वज्र खूब आठवण काढतोय..." हो सका तो आ जाना बेटा 'विजिटिंग अवर्स' में... वैदेही को बहुत याद कर रहा है..."

वैदेही ने आबा की आवाज़ सुन ली थी! चाय-बिस्किट खा कर वैदेही वज्र को मिलने की ज़िद करने लगी! हादसे के बाद वह अपने मित्रों में से किसी को भी मिल नहीं पाई थी, न ही हालचाल पूछ पाई थी... इतने दिनों से मोबाइल पर भी किसी से बात नहीं हुई थी उसकी! मुम्बई में अब उनके 'अभिनय कला ग्रुप' के दो ही मेंबर थे उपलब्ध....वैदेही और वज्र!
माँ ने ओला बुक की , कोविड के समय लाई हुई चेहरे की स्क्रीन वैदेही को पहनाई और दोनों आबा को सूचीत कर चल पड़ी ग्लोबल हॉस्पिटल की ऒर... आबा हॉस्पिटल के स्वागत कक्ष में ही उनका इंतज़ार कर रहें थे... एक समय एक को ही जाने की अनुमति थी.. वैदेही ने माँ को पहले भेजा.. "माँ! मैं यहीं पर रुकती हूँ.. आप पहले मिल कर आ जाईये..."
वज्र को डीलक्स रूम में शिफ्ट किया गया था... वातानुकूलित कक्ष, प्रशिक्षित नर्स और रूम में मरीज के पास एक रिश्तेदार की सोने की व्यवस्था... टीव्ही ...वगैरा..वगैरा...
आबा ने कहीं कोई कमी नहीं रक्खी थी वज्र के इलाज में! एकलौता बेटा, करोड़ों की दौलत... और गाँव की माटी से अद्भुत जुड़ाव! पैसा और लोगों को जोड़ना वह भली-भांति जानते थे! रात हो या दिन..किसी भी वक़्त मदद को तैयार... शायद उन्हीं की दुआएं थी जो इस बुरे वक़्त में आबा के काम आ रही थी...
वह विचारों की नाव में बैठ कर भूतकाल की सैर कर रही थी तभी माँ आई, " वैदेही! बेटा तुम जा कर आओ आबा के साथ... ध्यान रखना... वहॉं ज्यादा भावुक या उत्तेजित मत होना....."हो ग आई.. येते मी..." और वो आबा के साथ लिफ्ट की ऒर चल पड़ी...
वैदेही को देखते ही वज्र की आँखें चमक उठी... उसने वैदेही की तरफ हाथ बढ़ाया... आबा समझ गए.. "बेटा... तुम बात करो.. मैं अभी आता हूँ डॉक्टर से बात  कर कर.."
आबा के जाते ही वैदेही ने वज्र का हाथ होले से दबाया.. मानों कह रही थी.. मैं हूँ न तुम्हारे साथ... वज्र उसकी हथेली पर उंगलियाँ घुमा रहा था और वैदेही उसके घूँघराले बालों में... दोनों एक-दूसरे को बिना बोले ही बहुत कुछ कह रहें थे... मानों झील के पानी में अपना अक्स निहार रहें थे...
तभी डॉक्टर ने दरवाज़े पर दस्तक दे एंट्री ली... It's fine young boy! कैसा महसूस हो रहा हैं?  यहीं हैं क्या तुम्हारी वैदेही? बेहोशी में सिर्फ इसका ही नाम था जुबान पर... और फिर वैदेही की तरफ मूड कर कहा, "शुरुआती स्टेज हैं ... ऑपरेशन के बाद की... प्लीज Take care.... लव बर्ड्स! और वज्र की तरफ देख, उसे थपथपा कर मुस्कुरा कर बोले,"दवा लिख कर दूँ या अब जरुरत नहीं हैं उसकी? और सभी हँस पड़े! पलकों में ठहरे आँसू हीरे से चमक रहें थे.... दोनों को जीने का बहाना जो मिल गया था... वज्र! आराम कर...यार! लापरवाही बिल्कुल नहीं हं ... कल मिलते हैं .. वज्र ने फिर हाथ आगे बढ़ाया! वैदेही के स्पर्श से ही उसके चेहरे की मुरझाई पंखुड़ियाँ फिर तरोंताज़ा हो गई थी मानों किसी ने अमिरस पीला दिया हो...
दोनों ने एक-दूसरे को एक बार फिर ज़ी भर कर देखा और हाथ हिला कर वैदेही भारी मन से बाहर निकली पर बार-बार पीछे मुड़कर देखने का मोह न टाल सकी!
आबा के चेहरे पर संतोष की चमक थी.. वो समझ गए थे वैदेही की क्या अहमियत है उनके बेटे की ज़िन्दगी में! 
माँ भी बहुत दिनों बाद मुस्कुरा रही थी...रात ने सितारों भरा घूँघट ओढ़ लिया था....
वैदेही घर की देहरी पर पहुँच चुकी थी... वह रातरानी की सुगन्ध को महसूस कर रही थी! फ़िजा में उम्मीदों का रंग घुल चूका था... धरती का सीना चीर कर दो नवाँकूर हाथों-हाथ डाल चाँद को चुनौती दे रहें थे...और चाँद भी  स्थितप्रज्ञ सा इन जुगनुओं पर अपनी शीतल किरणे बरसा रहा था...

शेष कहानी अगले भाग में....
स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई, महाराष्ट्र 


इस पर लोग क्या कह रहे हैं
  • बहुत अच्छा लिखा है
  • बहुत ही सराहनीय है। इसे पढ़कर मुझे बहुत खुशी हुई
  • बहुत खूब.. दीप से दीप जलेंगे तो जीवन रोशन हो जायेगा! प्रेरणादायक सुन्दर प्रस्तुति!