मायका



वो मायके का सुकून

पीहर की यादें मन को सताती रहती हैं। रोजमर्रा के काम काज से मुक्त हो क्षणात पीहर हो आता है मन। पुनः तरो-ताजगी साथ लेकर ससुराल आ जाता है। माना कि ससुराल भी उतना ही, मानो न मानो उससे भी ज्यादा सुख-साधन भरा हो, पीहर तो पीहर होता है। माता-पिता के साथ बैठ हम सब बच्चें हो जाते है। हिलोर हिलोरे लेने लगता है। बहन भाई साथ हो तो मजा दुगुना हो जाता है। शरारतें करने को मन लालायित होता है। हँसी ठहाके, एक दूजे की टाँग खिंचाई...वाहहहहह मजा आ जाता है। आँगन में आम के पेड़ पर चढ़ बैठना, और कहना," मैं कहां हूँ?" एक दूजे को चिमटी निकालना, उन्मुक्त खिलखिलाकर हँसना, भेल पूरी, पाव भाजी, दादी के हाथों बने लड्डू सब मिल खाना,.छत पर अंताक्षरी खेलना, जोर-जोर से टिक टिक वन...टिक टिक टू...

खूब शोर करने को मन उतावला हो जाता है। पुरानी चीजें, उनको प्यार से सहलाना, छोटी-छोटी चीजों को हौले से छूना..

कितना सुकून, अपनापन, दुलार हैं मायके में।

माता-पिता का सर पर हाथ धर आशीष देना, पापा का पीठ थप-थपाकर शाब्बासी देना, माँ का सर पर हाथ फेरना। डर लगता है, ये पल समय की धारा में खो न जाए कहीं। भैया भाभी को सब मिल छेड़ते रहना, अलौकिक आनंद अनुभूति देता है। कोई भी उम्र हो चाहे, दूर हो या पास हो, पलभर भी पीहर हो आए, नए जोश, उल्लास, आनंद से मन की गठरी भारी हो जाती है।

भारी मन से विदा लेते आज भी आँखे भर आती है। बार-बार मन का पतंग उडान भरने लगता है। कभी पीहर हो आता है, कभी डोर कट जाती है।

चंचल जैन

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