ये मोदी मोदी क्यों है..
कभी-कभी 'मोदीजी' से रश्क होने लगता है! आखिर ऐसा क्या है मोदी जी में जो वो मिडिया की सबसे 'फेवरेट' पर्सनालिटी बने हुए है ! मोदी … मोदी … मोदी 'वन मैन बैंड' ....नहीं … नहीं! वन मैन .... जिसने सबकी 'बैंड' बजा दी है। …
मोदी .... एक ही व्यक्ति है जिसने राजनीति के पुराने खिलाडियों के छक्के छुड़ा के रख दिए है! राजनीति के घोर विरोधियों को भी एक छत के नीचे पनाह लेने के लिए मजबूर कर दिया है! अज़ीब सा माहौल है... 'गप्पू' से लेकर 'पप्पू' तक उनके काम के इम्तिहान के परचे जाँच रहे हैं .... जिन्होंने साठ साल में कभी देश की नब्ज को टटोला तक नहीं, जनता की उम्मीदों की किताब के पन्नें तक नहीं पलटे, देश को बुनियादी जरूरतें तक उपलब्ध नहीं कराई बल्कि सिर्फ अपने और अपने परिवार को उन्नति और समृद्धि के शिखर पर पहुँचाते रहे, वो आज मोदी सरकार के कामकाज की पर्चियाँ जाँच कर उन्हें दस में से शून्य नंबर दे रहे हैं !
देश-विदेश में अपने प्रयासों से, सूझबूझ से देश को मान-सम्मान के साथ निवेश के लिए प्राथमिकता दिलाने की कोशिश, रोजगार-सृजन के लिए निर्माण प्रक्रिया में तेजी लाने की दिशा में प्रयास, पडोसी देशों से बेहतर रिश्ते बनाने का प्रयत्न क्या देश के लिए जरुरी नहीं है? क्या आज के युद्ध विभीषिका से ग्रसित वैश्विक माहौल में ये कोशिशें आवश्यक नहीं हैं? नए रास्ते खोजना, नए साथी ढूँढना, नई दिशाओं में कदम बढ़ाना क्या विकास की ओर बढ़ते कदमों की आहट नहीं है?
हर बदलाव को वक्त की कसौटी पर खरा उतरने के लिए समय चाहिए ! जादू की छड़ी तो है नहीं कि घुमाई और हालात बदल गए! कई स्तरों पर काम करने की जरुरत है …देश हित में, सही दिशा में, ईमानदारी से, अनवरत, निस्वार्थ भाव से .... हर मुश्किल को पार करते हुए ,,,, हवा के विपरीत … धारा के विरुद्ध जाकर ....जहाँ आम आदमी का विश्वास, सहयोग और प्रयास निरंतर जरुरी हैं!
तमाम कमियों के बावजूद मोदी जी में आज भी लोगों को विश्वास हैं…आम जनता उम्मीदों का बोज़ा मोदी जी के कन्धों पर डाल कर निश्चिन्त हैं!
अपने आलोचकों को मोदी जी
'निंदक नियरे राखियें, आँगन कुटी छवाय, बिन पानी साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय' की तर्ज पर स्वीकार कर, देश को विकास के मार्ग पर अग्रेसर करने का प्रयास करेंगे … मोदी जी आम जनता की जिंदगी को खुशहाल बनायेंगे और देश के युवाओं के लिए नए भारत का निर्माण करेंगे यह उम्मीद आज भी करोड़ों भारतीयों में जिन्दा हैं!
जो लोग हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, अल्पसंख्यक, बहुसंख्यक के नाम पर भारतीयों को बांटने का सपना देख रहे हैं उन्हें अभी से सावधान हो जाना चाहिए क्योंकि आने वाली युवा पीढ़ी सिर्फ़ 'भारतीय' कहलाने में फक्र महसूस करती हैं न कि धर्म की दीवारों से टुकड़ों-टुकड़ों में बंटे युवा हिंदुस्तान में....
स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई, महाराष्ट्र