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दोहा: मुक्तक
डोर किसी के हाथ में, नाचे कोई और।
जीवन का सच जान ले, कर ले उस पर गौर।।
मेहनती जो मानवी, निश दिन करता काम~
वर माला गल जीत की, बनता वह सिरमौर।।
2.
ताटंक छन्द! मुक्तक
राजनीति की दलदल सारी, भलमानसियत है हारी।
चौखट पर थी दुनियादारी, आएं कब सच की बारी।
जनता के कंधों पर बैठे, छलते जनता को भोली ~
स्वार्थी नेता ओढ़ मुखौटा, भरमाते जन को भारी।।
3.रोला छन्द : मुक्तक!
फागण से है नेह, रंग बरसाएं होली।
जन-गण-मन से स्नेह, खूब ललचाएं टोली।।
भीगा सारा देह, रूपसी दुल्हन भीगी~
आग उगलता ढाक, खिली हैं सरसों पीली।।
स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।