पीहर का आँगन खींचे मोहे अपनी ऒर,
केसरिया चुनर ओढ़ आई मतवाली भोर!
सूरज के रथ के घोड़े दौड़े बादलों के बिच,
आँगन में खिली कलियां करें मिचमिच!
आँगन की मिट्टी में घुला माँ-बापू का प्यार,
दुआओं की नींव पर खड़ा है नन्हा संसार!
भैया-भाभी के स्नेह से भीगा मन अपार!
प्यारी बहना के दिल में छुपे राज बेशुमार!
अमृत क्षीर से सुवर्ण घट भर देती गईया,
लाल गुलमोहर, वो सहजन की फलियां,
कोयल की कुहूँक, खगों की चहचहाहट!
गुड्डा-गुड्डी की शादी बारातियों का जमघट!
बाबुल के आँगन में घुली आंसुओं की बुँदे,
बचकाना हरकतें, गिले-शिकवों के पुलिंदे!
बात-बात में लड़ना-झगड़ना-हँसना-रोना,
पीहर के आँगन की सौंधी मिट्टी का दोना!
वो सुनी-सुनी चौखट पे टिमटीमाता दीया,
अंधेरों को हर उजालों को चुमता जिया!
सेतु बन दो कुल को करीब लाती बेटियां!
सृजन-श्रुँगार कर पिया को रिझाती भार्या!
स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई |