शीर्षक : कहीं ये वहीं तो नहीं?"
यह कौन शिल्पकार है,
मातृभूमि के विराट स्वरूप का?
यह कौन फनकार है,
मां भारती के स्वर्णिम आलेख का?
यह कौन बागबान है,
वतन के गुलिस्तान में खिलखिलाती पौध का?
यह कौन रहनुमा है,
देश के नौनिहालों की लहलहाती फसल का?
यह कौन जौहरी है,
जो तराशता हैं बेशकिमती हिरे-जवाहरात को?
यह कौन रचनाकार है,
जो बलशाली बना रहा देश की नींव को?
यह कौन संगीतकार है,
जो सुर दे रहा दबी-कुचली आवाज को?
यह कौन जादुगर है,
जो ऊर्जा दे रहा अंतरिक्ष में टोह लेने उपग्रह को?
कहीं यह वहीं तो नहीं,
जिसकी जिंदगी गुज़र जाती हैं,
अपने बच्चों की परवरिश के लिए,
सावकारों की देहरी पर माथा रगड़ते रगड़ते?
कही यह वहीं तो नहीं,
जिसके जूते घिस जाते हैं,
खुद का घरौदा बनाने के लिए,
शेड्यूल बैंकों के चक्कर लगाते लगाते?
कही यह वहीं तो नहीं,
जिसकी कमर टूट जाती है,
बीमार पत्नी का ईलाज कराने,
सरकारी अस्पतालों की कतारों में खडे खडे?
कही यह वहीं तो नहीं,
जिसके सपने बिखर जाते है,
शाखों से टूटे पत्तों से तितर-बितर ,
अपनी ही कमाई हासिल करने में?
जी! यहीं तो हैं ...
देश का शिल्पकार,
भविष्य निर्माता,
अध्यापक, शिक्षक!
"तमसो मा ज्योतिर्गमय" का मंत्रोच्चार करता,
दुनिया को आलोकित करता!
खुद 'दीए तले अंधेरा' बन,
'नई सुबह' का इंतजार करता,
मन में अटूट विश्वास लिए!
स्वरचित तथा मौलिक
द्वारा कुसुम अशोक सुराणा, पवई, मुंबई, महाराष्ट्