स्वतंत्रता की देवी!

शीर्षक: स्वतंत्रता की देवी!

स्वतंत्रता की देवी!
क्यों अटके अश्क पलकों में,
क्यों नयनों में नीर?
क्यों सूखी गुलाब पंखुड़ियां,
क्यों अधर अधीर?
क्यों नि:शब्द रुणझुण पायल,
क्यों होंठ मूक-बधिर?
हिरक महोत्सव की बेला पर,
क्यों बिखरा गुलाल, अबीर?
क्यों शूल से विदिर्ण हैं चीर- चीर?

माँ भारती!
शक्ति स्वरूपा!
भृणहत्या के वार से बचकर,
दहेज़लोभियों के पंजो से छूट कर,
अस्मिता की हर जंग लढ कर,
नित अनगिनत अग्नि-परीक्षाएँ देकर,
भेद-भाव के मकड़जाल काँट कर,
जंजीरों को उखाड़ फेंक कर,
माँ स्वतंत्रते! 
आई हूँ तेरी मखमली कुक्षी में ...
वक्षों से अमृत-रसपान करने,
प्राची के अधरों को छूने,
नव-प्रस्फुटित रश्मियों से खेलने,
पुरवा के आंचल से लिपटने,
फूलों के परागकणों को बिखेरने,
सौरभ से फिज़ा को महकाने,
धरा को सुजलाम्-सुफलाम् करने,
अंकों पर तेरे खरगोश सी उछलने,
रग-रग में ऊर्जा, उत्साह को भरने,
यौवन मधुरस जाम छलकाने,
माँ भवानी! 
तेरी कृपा दृष्टि, शक्ति को पाने!
तव चरणों पर 'कुसुम' अर्पित करने!
जननी जन्मभूमि! 
माँ! तेरा अंश हूँ मैं, चली हूँ मैं ....
अंतरिक्ष की टोह लेने,
शशि-मंगल पर झंड़े गाड़ने,
रणचंडी बन शत्रु को खदेड़ने,
आतंकी सहस्त्र फणी नाग कुचलने,
हिमशिखरों पर तिरंगा फहराने, 
विश्वगुरु बन धर्म-कर्म-मर्म समझाने,
ज्ञान-विज्ञान का डफ-डमरु बजाने,
मानवता का अलहद शंखनाद सुनाने,
गुलशन-गुलशन अमन-चैन के गीत गाने,
पर्यावरण को स्वार्थी तत्वों से बचाने,
'जियो और जीने दो' का संदेश देने!

माँ! 
ओजस्वी, ऊर्जापुंज मैं!
जननी, जन्मभूमि!
माँ..तेरा अक्स मैं!
समय की बहती धार मैं!
तेरा अविचल प्यार हूँ मैं!
तुझ पर सदा कुर्बान हूँ मैं!
तिरंगा लहराते-लहराते...
तिरंगे में लिपट आऊ मैं!
अस्मत की हिफाजत में, 
माँ भारती!
तुझ पर सदा वारी-वारी जाऊं मैं!
शहादत पें मेरी अश्क न बहाना!
अंको पें तेरे सुलाना माँ!
तिरंगे से मुझे ढक देना माँ!
केसरिया गेंदे के फूलों से,
अर्थी को सजा देना माँ!
चिता की आग ठंडी होने से पहले,
कुक्षी में रक्तबीज, संवारना माँ!

स्वरचित तथा मौलिक,
द्वारा कुसुम अशोक सुराणा, मुंबई, महाराष्ट्र!

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