इम्तिहान! ज़िन्दगी ले रही इम्तिहान बार-बार?
क्या गुनाह है ज़िन्दगी से बेइंतहा प्यार?

ठूँठ में छुपा जद्दोजहद का सैलाब !
पतझड़ में उम्मीदों का माहताब! 
कोंपलों के जिद्दी बच्चे से कहकहें,
दास्ताँ-ए-दिल, भूले-बिसरे अनकहें!

ज़िन्दगी! हंसायें कभी रुलायें बार-बार?
क्या गिला करें ज़िन्दगी से हर बार?

धरा का अंक चीर बीज निहारे व्योम,
पत्थरों के बीच खिलखिलायें कुसुम!
मृगजल पीछे भागते मन का खेल, 
भीगी रेत में फले-फूले खरबूजे-बेल!

ज़िन्दगी! काँटों की सेज पर इंतज़ार!
क्यों ख़्वाब बुने मकड़ी से सौ बार!

पूरब में सूर्योदय, पश्चिम मे सूर्यास्त!
क्यों सुख-दुःख से जीवन-फलक व्याप्त?
प्रात: उड़ान भरे परिंदे छोड़ नीड को, 
गोधूलि बेला में लौटते भूल थकान-पीड़ को !

ज़िन्दगी! क्यों पिघलती हैं बर्फ बेशुमार?
बर्फ की सतह तले छुपी है मीठी जलधार!

स्वरचित तथा मौलिक,
द्वारा कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई |
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