माँ! माँ!
कहां छुपी हो तुम?
क्षीरसागर की असीम गहराइयों में?
हिमशिखरों की उतुंग चोटियों में?
वसुंधरा के विशाल आँचल तले?
ब्रह्मांड की अनबुझी पहेलियों में?
प्यार के बेहद पवित्र एहसास में?
माँ!
क्यों आशिषों की ठंडी छांव तले,
रेशमी शामियाने सजाती हो?
लूटा कर बेशुमार प्यार-दुलार...
दुआओं की बारिश करती हो?
क्यों छुप-छुप निहारती हो,
चौड़ी दरारों से अपने अक्स को ?
माँ!
बेहद खामोशी से पढ़ लेती हो..
चेहरे पें उभरी लकीरों को!
क्यों होले से थपथपाती हो,
लाल, गुलाबी गालों को?
क्यों उंगलियों से सहलाती हो, 
बेहद घने, घुंघराले बालों को?
माँ!
क्यों अंधेरों में खो जाती हो?
जरा सी आहट महसूस कर,  
क्यों चाँद के दीदार का वादा कर,
अपने ही खून को तडपाती हो?
क्यों खुला अंबर नहीं देती,
ज्वालामुखी सी उबलते आक्रोश को?
माँ!
क्यों सहते-सहते मिटती हो पर...
गर्म लावा बहने नहीं देती?
वक्त की ढलानों पर माँ
क्यों बेहद तन्हाँ छोड़ गई?
बच्चों के हिस्से का मखमली स्पर्श...
क्यों स्याह रातों में समेटे चल दी?
माँ!
बेहद अकेले रह गए हैं माँ...
तेरे आँचल के छूट जाने के बाद...
दिन रात भटकते रहते हैं माँ...
तेरे जादुई स्पर्श को पाने मेरी जान!
तेरी दुआओं के शामियाने तले है माँ!
मेरा सज़ा-धजा, खूबसूरत जहान!

स्वरचित तथा मौलिक,
द्वारा कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।

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  • वाह वाह! बहुत खूब! सुन्दर प्रस्तुति!