सूर घनाक्षरी छंद
सूर घनाक्षरी छंद


शीत ऋतु चली आई,
कलियाँ ले अंगडाई,
मनहर मनोरम,
सृष्टि हरषाई।।

बलखाती मनचली,
ओढ चली अलबेली,
चुनरिया सतरंगी,
धरा इतराई।।

थर थर कांपे गात,
धुप लगती सौगात,
शाॅल, स्वेटर, रजाई, 
ठंडी गरमाई।।

मूली परांठे नरम,
चाय पिओ जी गरम,
हीटर के पास बैठो,
खुशी लहराई।।

स्वरचित मौलिक रचना 
चंचल जैन
मुंबई, महाराष्ट्र
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