2 1 2933 2 2933 सूर घनाक्षरी छंद सूर घनाक्षरी छंदशीत ऋतु चली आई,कलियाँ ले अंगडाई,मनहर मनोरम,सृष्टि हरषाई।।बलखाती मनचली,ओढ चली अलबेली,चुनरिया सतरंगी,धरा इतराई।।थर थर कांपे गात,धुप लगती सौगात,शाॅल, स्वेटर, रजाई, ठंडी गरमाई।।मूली परांठे नरम,चाय पिओ जी गरम,हीटर के पास बैठो,खुशी लहराई।।स्वरचित मौलिक रचना चंचल जैनमुंबई, महाराष्ट्र Label Directed by द्वारा चंचल जैन Shared18 Nov 2025 Start 18 Nov 2025 End 18 Nov 2030 The Critic’s Corner इस पर लोग क्या कह रहे हैं टिप्पणी लिखें कुसुम सुराणा 19-Nov-2025 Comment Like वाह! 👌👌 सूर घनाक्षरी छंद © टिप्पणी 400 characters remaining जमा करें रद्द करें