नमन माँ शारदे!
महाचण्डिका छन्द!
वंदन गुरु को हो सदा, विघ्न टले सब राह के।
विपदा जब-जब आ खड़ी, टूटे भ्रम सब चाह के।
रास्ता कंटक से भरा, रखो भरोसा जीत में।
मंजिल तेरे सामने, खो मत जाना मीत में।।
मार्ग सरल अब है नहीं, धैर्य परीक्षा है यहीं।
गुरुजन शासन के बिना, ज्ञान प्राप्ति होती नहीं।
मन में आदर-मान हो, गुरु प्रति उन्नत भाव हो।
ज्ञान-गंग सुखदायिनी, वाणी अमि-उमराव हो।।
छन्द महल वासी नई, नित्य करूं मैं साधना।
खूब करूं आराधना, सुन्दर कल की कामना।
नमन करूं गुरु मैं तुम्हें, नैया मेरी तार दो।
भव-भव फेरों से मुझे, मुक्ति पंथ उपहार दो।।
स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।