ये प्यार ही तो ज़िन्दगी... भाग ७९
भाग ७९

सूरज पश्चिम की ऒर सरकने लगा था मानों कान्हा को देख राधा की वक्ष से ढलती चुनर। आसमान कुछ पलों के लिए क्रोध से लालम-लाल हो गया लेकिन धीरे-धीरे चिंता महाठगनी के आँचल के भीतर छुपने लगा। प्रकृति उसकी बचकना हरकत पर मुस्कुराने लगी। रात के अंधेरों में ढेरों सितारे चमकने लगे और जानकी जी और वैदेही वज्र के यहाँ जाने के लिए निकल गई।

आजी सोफा पर बैठ कर उनका इंतज़ार ही कर रही थी। थोड़ी-थोड़ी देर बाद वह फाटक की ऒर देखती और फिर अपने काम में लग जाती। शाम को जैसे ही दीया जलाने का वक़्त होता वह पहले तुलसी वृन्दावन में दीप रखती, फिर देहरी पर और फिर मंदिर में विघ्नहर्ता के सामने। 'शुभम करोति कल्याणम'... का निनाद घर में गुंजते ही  घर मोगरे की अगरबत्ती की सुगन्ध से भर जाता। 

आजी को मोगरा बहुत पसंद था। भास्कर राव हमेशा आजी के लिए मोगरे की वेणी लाते। यह सिलसिला उनका अस्सी की उम्र में भी जारी था । जितने प्यार से आजोबा वेणी लाते उतने ही प्यार से आजी उसे बालों में सजाती और आजोबा को पूछती, " बरोबर लागली का हो विनु चे बाबा? और आजोबा मुस्कुराते, " वेडी! पहिल्यांदा चं लावतेस काय?" और आजी मन ही मन आनंदित हो जाती। आजी का जन्मदिन, शादी की सालगिरह और 'वैलेंटाइन डे' सभी उत्सव 'मोगरे की वेणी' से ही पट जाते थे। यहीं छोटी-छोटी खुशियाँ थी मोगरे के फूल सी जो आज भी जीवन को महका रही थी।

जानकी जी और वैदेही ने आते ही आजी के चरण छुएं और दोनों सोफा पर बैठ गई। वैदेही की नजरें शायद किसी को ढूंढ़ रही थी और आजी उस नज़र को, उसकी छटपटाहट पहचान गई थी। वह बोल पड़ी, "वज्र येतोय! आपल्या खोली मध्ये आहे!"

आजी की बात ख़त्म होने से पहले ही वज्र वहाँ उपस्थित हो गया था। आजी ने वैदेही को वज्र के साथ जाने को कहा और खुद व्यस्त हो गई जानकी जी से बातें करने में। 

यह कैसी विडम्बना हैं कि बुजुर्गों को उनके साथ बात करने वाला कोई न कोई चाहिए होता हैं और युवाओं के पास वक़्त नहीं होता हैं जिन्होंने उनके लिए अपने जीवन के अनमोल पल दाँव पर लगाएं हो। वो अपनी रोजमर्रा की ज़िन्दगी में उलझें होते हैं और बुजुर्ग एकाकीपन में।

जब भी वज्र बचपन में पूछता, " आजी! हम खुद ही बाप्पा को ढ़ोल-नगाड़ों के साथ घर, पंडाल में लाते हैं, उसकी पूजा-अर्चना करते हैं और फिर उन्हीं को क्यों समंदर, नदी, तालाब, झील में विसर्जित कर देते हैं?" आजी मुस्कुराती और कहती," अरे वेड्या! बाप्पा म्हणतो, नको जीव लाऊ मला! सोड मोह!" और नन्हें से बच्चें की जिज्ञासा पर मन ही मन हँसती और खुद से ही कहती, " इतना आसान हैं क्या अपनों से मोह छोड़ना?"

जानकी  को अकेली देख आजी बोल पड़ी, "पोरी! वैदेही च्या लग्नाचा काही विचार केला का नहीं?"  जानकी जी बेचारी खामोश रही! वह क्या कहती? बिना बाप की बेटी! बेटी की जान माँ में और माँ की जान बेटी में अटकी हुई थी! वह बुझे-बुझे मन से बोल पड़ी, " आजी! कोणी चांगला मुलगा भेटला तर... आजी बोल पड़ी, " काखे ला कळसा अन गाँवाला वळसा! देखा नहीं बच्चें 
कैसे एक दूजे के पीछे  भाग रहे हैं? वैदेही आणि वज्र एक दूजे से प्रेम करते हैं यह कैसे समझ में नहीं आया तुम्हारे? माँ न तू उसकी?"

जानकी जी आजी को देखती ही रह गई। चेहरा पढ़ने का यह गज़ब का हुनर कहाँ से आया आजी को? वह बोल पड़ी, " आजी कहाँ आप, कहाँ हम? कहाँ राजा भोज, कहाँ गंगू तैली!"

आजी ने सिर्फ जानकी जी के कन्धे थपथपाएं! अब वह बच्चों के दिल की टोह लेना चाहती थी। दोनों कमरे में बातों में मग्न थे। कराड से आने के बाद वज्र ने कृष्णा-कोयना के संगम स्थल 'प्रीती संगम' का मनोरम दृश्य कैनवास पर उतारा था। 

गोधूलि बेला में अस्ताचल के सूर्य का वह मोतीचूर के लड्डू सा सुन्दर रूप, शांत -शीतल कृष्णा के पात्र में पड़ता उसका प्रतिबिम्ब, किनारे की ऒर घने वृक्ष, दूसरी ऒर सूर्य को अर्ध्य देता युगल और पीछे प्राचीन मंदिरों की श्रृंखला! वैदेही कलाकार के मन का प्रतिबिम्ब उसमें देख रही थी। 

तभी वज्र ने वैदेही का हाथ हाथ में लेकर पूछ लिया, " वैदेही! जीवन भर साथ निभाओगी मेरा! वैदेही नि:शब्द थी। एक तरफ अकेली माँ और दूसरी तरफ उसका प्यार। न तो उसने अपना हाथ वज्र के हाथ से छुड़ाने की कोशिश की न कुछ जवाब दिया! कभी-कभी मौन ही सवालों का सकारात्मक जवाब बन जाता हैं।

तभी आजी की आवाज़ सुनाई दी। वह सबको भोजन के लिए बुला रही थी। आजी के राज में डाइनिंग टेबल नहीं पाट और आसान का चलन था लेकिन अब आजी भी 'आधुनिक और भद्र' समाज का हिस्सा हो गई थी। वह जानती थी अगर युवाओं के बिच जीना हैं तो खुद को नवाचारों से परिचित कराना जरुरी हैं वरना वो अनुपयोगी समझ कर उपेक्षा के डिब्बे में फेंक दिए जाएंगे। 

वैदेही ने सभी के लिए आसन बिछाये, पाट सजायें और सभी साथ में ही खाना खाने बैठ गएं। आजी ने सबके लिए आलू की सब्जी, श्रीखंड-पुरी, साथ में पुलाव और पालक के पकौड़े भी बनवाएं थे। सभी खाने का मज़ा ले रहे थे तभी आजी बोल पड़ी, " वैदेही! वज्र ला पुराणपोळी लई आवडते! तुला येते का गं बनवायला? " आजी का दाँव शायद सही पड़ा था। वैदेही ने शर्मा कर सिर्फ मुंडी हिलाई और नीचे देख कर थाली में पुरी इधर-उधर करने लगी। वैदेही की ख़ामोशी और बेचैनी दोनों साथ-साथ बहुत कुछ कह गई थी। अब आजी को पूरा विश्वास हो गया था कि दोनों एक-दूजे को चाहते हैं।

आजी का मन आज बहुत प्रसन्न था। उसे भास्कर राव जी की रह-रह कर याद आ रही थी। यादों के परिंदे भी एक बार स्वच्छन्द विचरण करना शुरू कर देते हैं फिर कोई नहीं बता सकता की वे लौट कर किस डालपर आकर विश्राम करेंगे!  

भास्कर राव की बहुत इच्छा थी कि वैदेही जैसी समझदार लड़की इस घर में बहु बन कर आए! उन्हें न जाने क्यों उसकी सादगी, सरलता और प्रखर बुद्धि पर भरोसा था। वह अक्सर कहते वैदेही जैसी बहु मिल जाये तो वह प्रतिभा जी के जैसे ही घर को संभाल लेगी। वह जानते थे आदमी रात दिन मेहनत कर धन कमाता हैं लेकिन उसे सही तरह से सँभालने, संजोने का काम तो गृहलक्ष्मी ही करती हैं। आजी इस बात के लिए हमेशा विघ्नहर्ता का आभार व्यक्त करती कि उन्होंने कभी उनकी झोली खाली नहीं रक्खी। अब तक जो सोचा, जैसे सोचा, ऊपरवाले ने दिल खोल कर दिया था उन्हें!  वह चाहती थी कि वज्र के मामले में भी उनकी इच्छा पुरी हो लेकिन अभी तो आबा से भी बात करनी बाकी थी और क्या पता विघ्नहर्ता के मन में क्या हैं....

स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।
अगला भाग अगले अंक में....


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