रंग!

"वाह! बहुत सधे हुए खिलाडी हो आप! बड़ी रंगीन तस्वीर बनाई है आपने अपने उत्पाद की!   
चेहरे की लाली रहे न रहे, अधर लाल, कथई, मरून, गुलाबी दिखने चाहिए न! यूँही नहीं बनाएं आपने लिपस्टिक के इतने शेड्स" वह कह रही थी।

वैसे भी महंगाई की मार से चेहरे का नूर तो काफूर हो ही जाता है.. एक होंठ ही तो हैं, जो बिनधास्त यौवना के चेहरे पर अपनी अलग-अलग छटाएँ बिखेर देते हैं।

"अरे आप! मैडम जी! क्या कहा आपने? हमारे बालों का रंग... क्यों बेन...सिर्फ सफेद-काला ही क्यों हों? बाकी रंगों से क्या दुश्मनी है? आखिर यह एक-दो रंगों की ठेकेदारी कब तक चलेगी? रंग दो बेन .. हमें भी...प्यार के रंग में! कभी बैंगनी, कभी सुनहरे रंगों से तो कभी मेहंदी से हथलियों के साथ-साथ बालों को भी रंग दो! हुजूर...आखिर हर्ज क्या हैं? "

आखिर ललनाएं हो या प्रोढा, बुढ़ा हो या गुबरू जवान छैल-छबिला, सजना तो है... सब को!

षोडशी के झूमके, हार, कंगन के साथ अगर बालों, होठों को भी मैच कर दें तो किसे परेशानी हैं जी?

कभी केरल हो आये हो? कथकली नृत्य देखा है? कैसे पुरुष पात्र अनेक रंगों से अपना श्रुँगार कर नृत्य करते हैं, कैसी रंगबिरंगी तस्वीर होती हैं इन पुरुष पात्रों की! मोहिनी अट्टम हो या अन्य असंख्य नृत्य शैलियाँ... पात्र का श्रुँगार कैसा गज़ब जादू करता है, देखा न आपने?

क्या करें? श्वेत-श्यामल तस्वीर का जमाना तो कब का इतिहास जमा हो चूका है...अब है इंद्रधनुष के सप्तरंगों का जमाना! छायाचित्र भी हो तो कैसा सप्तरंगों से सजा-धजा, चलचित्र भी हो तो 'इस्टमन कलर'!

त्यौहार कोई भी क्यों न हो, जब तक नवरंगों की आभा नहीं बिखरती, दिमाग़ की बत्ती नहीं जलती, रोशनी का जलवा नज़र ही नहीं आता... फिर वह होली हो या दीवाली, नवरात्रि हो या गणेशोत्सव, पंढरपुर की वारी हो या जगन्नाथ पुरी की रथ यात्रा... रंग तो रंग होते हैं। हमारी जिंदादिली का प्रमाण! हमारी मौ मस्ती का आईना! दीयों की जगमगाहट तो चाहिए जी...स्वदेशी का नारा लगाते नगाते भले ही ये दीपमालाएं हमारे धूर्त कपटी दुश्मन देशों से ही क्यों न आयात की गई  हो...

रंगबिरंगी खिलौने या हमारे देवी-देवताओं की मूर्तियां क्यों न हो..जिन्हें सोने की तश्तरी लेकर बाज़ार सौंप दिया हैं, उनसे दुश्मनी भले ही हो या  दोस्ती (?) शुभ-लाभ अपनों का क्यों हो जी? आखिर हमारे पडोसी हमसे आस लगाएं बैठे हो...  लक्ष्मी जी (विदेश में बनी हुई) को प्रतिष्ठापित कर हम पूजा अर्चना करेंगे और वो मीचमीचि आँखों वाले इंतज़ार करेंगे कि कब सुवर्ण सिक्कों से भरा कलश उनकी ठोकर से ही यजमान के नहीं मेहमान की झोली में आ गिरेगा! आखिर 'अतिथि देवो भव' का ब्रह्मनाद करता देश है जी। अब शरणागत का कारवाँ क्यों न आएं, राष्ट्र धर्मशाला भी बन जाएं तो क्या? सिर्फ रंग अलग-अलग होने चाहिए जी दरों-दीवारों के ! अब जब नीली छतरी वाले ने, परमपिता ने रंग उंडेलते हुए कंजूसी नहीं की तो हम क्यों करें? 'विश्वची माझे घर' का उच्च विचार लेकर शरणागत यहाँ पधार रहे हैं तो सभी वोट-परस्त नेताओं को उनका तहेदिल से स्वागत तो करना ही पड़ेगा न! वो आकार भले ही हमारी धरा का रंग हमारे ही अपनों के खून से लाल क्यों न करें, स्वागत तो हमें करना ही होगा न!

प्रकृति माँ की नवरंगी चुनर जब असंख्य छटाएं बिखेरती है तो आँखें तृप्त हो जाती हैं। जब ऊपरवाले ने इतनी सुन्दर-सुन्दर रंगीन तस्वीरें बनाई हैं तो हम क्यों पीछे रहें? क्यों न हम अपने जीवन  को इंद्रधनु के विभिन्न रंगों से तर-बतर कर जी लें?

स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।


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