नारी नारायणी
अंतरराष्ट्रीय  महिला दिवस लेखन प्रतियोगिता

नारी नारायणी

भारतीय संस्कृती नारी को परम प्रभु की सर्वश्रेष्ठ कृति मानती है। देवी-सा सम्मानित करती है। नारायण की नारी नारायणी है। पति की प्रिया, अर्धांगिनी।
शक्ति, भक्ति प्रेम स्वरूप। जगत जननी है नारी। मोह, माया, ममता का लहराता आंचल। दया, क्षमा, करुणा मूर्ति। संयम, समर्पण की निर्मल धारा।
समाज के हर क्षेत्र में पुरुष के कंधे से कंधा मिलाकर साथ निभाती है नारी। पुरुष प्रधान सामाजिक व्यवस्था में अपना वजूद संजोती। अपने अस्तित्व को निखारती, व्यक्तित्व को तराशती। आज अंतरिक्ष से सागर तल की गहराई छूती नारी उज्जवल भविष्य गढ़ रही हैं। आज उसके झिलमिल सतरंगे सपने सच हो रहे है। आपा धापी, रोजमर्रा के तनाव में भी वह जिंदगी की रेल पटरी पर दौड़ने में सफल हो रही हैं। बच्चों की परवरिश हो या घर आंगन को सहेजना, वह सहज ही सब समेट लेती है। ज्ञान, कौशल, खेल, अनुसंधान हर क्षेत्र में अपनी जीत का परचम लहरा रही है। चुनौतीपूर्ण हर कार्य बडी कुशलता से कर लेती है। 
लेकिन यह बात कुछ विशेष तबके की 
हुई। नारी का किसी न किसी रूप में शोषण आज भी जारी है। इसके लिए जिम्मेदार कुछ हद तक नारी भी है। जो बेटा-बेटी में भेद भाव करती है। जो अपनी औलाद को मानवता के संस्कार नहीं दे पाती। कहीं कहीं दानवता हावी हो जाती है, कभी बदले की भावना, नारी को नीचा दिखाने की मनीषा से उसे प्रताडित किया जाता है।
उचित होगा, उसे अपनी सुरक्षा के गुर सिखाये जाये। आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाया जाये। सुशिक्षित, आत्मनिर्भर, सक्षम नारी समाज भूषण होगी। उज्जवल भविष्य की आभा, विभा और संसार की शोभा होगी।
माना, नारी उत्कर्ष चरम पर है। फिर भी हमारे हाथों से सुख, चैन फिसलता जा रहा है। अकेलापन, काम काजी महिला की व्यस्तता का असर बच्चोंपर हो रहा है।
सामाजिक ढांचा चरमरा रहा है।
नारी घर बाहर दोहरी जिम्मेदारी निभाते थक रही है। मैं सोचती हूं, जरूरतमंद महिला ही अर्थाजन के लिए कोशिश करे। अपने हूनर को चमकाने, लेकिन घर को अव्यवस्थित न होने दे। शौक मौज के लिए अपना घरौंदा औरों के भरोसे न छोडे। 
सोचे हमने क्या पाया, क्या खोया। अपने परिजनों के साथ ताल-मेल बिठाये। सपनों की उड़ान भरने से पहले नाप-तोल ले।
अपनों के लिए जिये। दिखावा, आडंबर महत्वपूर्ण नहीं। बेहतर जिंदगी जीना मकसद हो। स्वस्थ, मस्त रहे हम सब।

चंचल जैन
मुंबई, महाराष्ट्र 

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