भाग ६
चहूँऒर घना कोहरा छाया हुआ था... वैदेही नर्म रजाई लपेट आज इत्मीनान से सोई हुई थी! माँ ने उसे जगाना उचित नहीं समझा और अपने काम में व्यस्त हो गई! सुनहरी धूप में गुटर-गूं करते, दाना चुगते कबूतरों की आवाज़ से वैदेही की नींद खुली .. मुँह से रजाई हटा कर उसने जैसे ही खिड़की के पर्दे सरकायें , सूरज की किरणों ने उसके मस्तक को चुम लिया और मस्तक पर कुंकुम तिलक कर उसे आशीर्वाद दिया!...आज न तो सूरज की रश्मियों ने उसे जगाया न माँ ने! उसने अंगड़ाई ली, आईने में देख बालों को संवारा और ब्रश करते-करते रसोई में पहुँच गई!
"क्या बात हैं बेटा! आज तो बहुत अच्छी नींद आई थी तुम्हें... जगाने आई थी मैं तुम्हें पर तुम तो खर्राटे ले रही थी...मैंने सोचा, " क्यों डिस्टर्ब करूँ..जब उठेगी, तब कर लेगी नाश्ता.. मैसूर डोसा बनाना हैं... जब उठेगी, तब गरमागरम बना लुंगी... बेटा! अभी बना दूँ? तभी रिंग टोन बजने लगी..
'बिखरे सभी बारी-बारी....' सुनते ही माँ बिगड़ गई...वैदेही ! ये क्या रिंग टोन सेट की हैं? पहले इसे चेंज कर ....और कोई अच्छा गाना नहीं मिला तुझे...उल्हास, मस्ती भरा..?
वैदेही ने फ़ोन उठाया! यश जयपुर से बात कर रहा था...
उसकी आवाज़ सुनते ही वह उछल पड़ी..
कैसा हैं यश? सब ठीक तो हैं न? छुट्टी मिल गई तुझे हॉस्पिटल से? कब आ रहा है तू मुम्बई? सामने से हँसी फूट पड़ी... तू आज भी बोलने नहीं देगी न मुझे? एक-एक कर के पूछ न.. 'डेक्कन क्वीन'..ऐसे पूछ रही हो मानों गली का कुत्ता पीछे लग गया है... यार! मैं ठीक हूँ! तू कैसी है?
'ऑल इस वेल'? वज्र से मिली थी तुम वैदेही ?
पूरे पंद्रह मिनिट लगे रहे दोनों फ़ोन पर...अंत में वैदेही ही बोल पड़ी...यश... लगता हैं तूने दो-तीन कचोरी ठूंस ली हैं! तभी यश बोल पड़ा....अरे कहाँ मेरे नसीब में अकेले-अकेले खाना लिखा हैं? तुम सारे मेरे चटोरे दोस्त.... मैं अकेले खाता... तो हजम होने देते? दोनों खिलखिला कर हँस पड़े..
वैदेही ने नाश्ता किया और कुछ देर के लिए वह गैलरी में आराम कुर्सी लगा कर बैठ गई! दोपहर के खाने में माँ ने आज 'उकडी चे मोदक' बनाये थे.. गणपति बाप्पा को भोग जो लगाना था ! माँ ने आबा को फ़ोन कर बुलाया और वज्र के लिए भी मोदक भेजे!
माँ ने ग्लोबल हॉस्पिटल में ही आज के लिए डॉक्टर की अपॉइंटमेंट ले ली ताकि वज्र से मिलना भी हो जाए और वैदेही का 'फॉलो अप' भी! तभी फोन की रिंग टोन बजी.....' हर घड़ी बदल रही हैं धूप ज़िन्दगी....' माँ कुछ सवाल करती उसके पहले ही वैदेही ने फ़ोन उठाया! विभा के पापा यशवंत राव जी बोल रहे थे... बेटा! 'न्यू नार्मल' हैं न... वैदेही? विभा भी रिकवर हो रही है... तुम सब को बहुत मिस कर रही है! आगे के इलाज के लिए अभी 'वेट & वॉच' ही कर रहें हैं... 'टेक केयर' बच्ची! बाय-बाय.....
वैदेही बहुत दिनों बाद खिली-खिली सी लग रही थी मानों बारिश की बूंदों में भीगा गुलाबी गुलाब!
माँ की जद्दोजहद देख वह नि:शब्द थी..कितना सहती हैं एक माँ अपनी बच्ची के लिए! क्या बीती होगी माँ पर, मुझे लहूलुहान, बेहोशी की हालात में देखकर....फिर यादों के भंवर में वह खो जाती उसके पहले ही माँ बोल पड़ी... "आता कशी छान रिंग टोन वाजते... वैदेही! एक बार कांच का गुलदस्ता गिरा.. फूल बिखर गएँ .. अनहोनी, होनी बन गई...ठीक है... लेकिन अब नया वज्र सा गुलदस्ता पानी से भर कर, फूलों से सजाना है... उम्मीदों के पानी से रंग-बिरंगी फूलों की खुशबू को, सुंदरता को जिन्दा रखना हैं"
वैदेही फिर खयालों में खो गई... हॉस्पिटल का गाउन पहन कर पूरी उकता गई थी वह ...अलमारी से उसने एक गुलाबी ड्रेस निकाला.. नाजुक कशीदाकारी से सजा सुन्दर पंजाबी सूट... कितनी यादें जुडी थी इस परिधान से उसकी... उसने बालों की कंघी की और तैयार होने लगी...
माँ उसका इंतज़ार कर रही थी.. उसे देख कर बोल पड़ी.. "थांब.. दृष्ट काढ़ते पोरी...." नज़र उतार कर वह निकल पड़ी!
वज्र के कमरे में प्रवेश करते ही आबा आई के हाथों से बने मोदक की भूरी-भूरी प्रशंशा करने लगे... वज्र चाय के साथ बिस्किट ले रहा था! आबा नीचे जाने के लिए उठे.. जानकी जी नीचे ही बैठी थी... वैदेही को देखते ही वज्र के चेहरे पर नूर आ गया..बिस्किट वैदेही की तरफ कर वह उसे निहारने लगा! मानों उस टेबल पर रक्खे फूलदान में सजा ताज़ा गुलाब का फूल! "कितना फब्ता हैं गुलाबी रंग इस पर.." वह अपलक उसे निहारता रहा.. आखिर वैदेही बोल पड़ी.."पहिल्यांदाच पाहतोयस का मला?"
वज्र फिर मुस्कुराया... हाँ यार.. इतना ध्यान से.. पहली बार ही देख रहा हूँ... वैदेही! उसने वैदेही का हाथ हाथ में लिया और बोल पड़ा.."साथ दोगी न मेरा?
पता नहीं किसका दिल धड़क रहा हैं मेरे सीने में... लेकिन जरूर बड़े दिल वाला होगा वह... मुझे गज़ब का आत्मविश्वास आ गया है वैदेही! हम फिर करेंगे नुक्कड़ नाटक.. विषय होगा.. 'अंगदान.. श्रेष्ठ दान '...
विनय की क्या खबर हैं? नेपाल ले गए उसके माता-पिता उसे? उसको कॉल करके बोलता हूँ मैं..डॉक्टर ने अभी अनुमति नहीं दी है मोबाइल के इस्तेमाल की ... कहते हैं.. तनाव, अवसाद से दूर रहना होगा...वैदेही! प्लीज... तू कर ले न बात उससे....तेरी मीठी आवाज़ सुनकर वो ऐसे ही ठीक हो जायेगा! वैदेही! तुम बोलती क्यों नहीं? वैदेही की ख़ामोशी उसके बोलने से भी ज्यादा मुखर थी।
वैदेही ने वज्र का माथा चूमा और बोल पड़ी... "किती रे बोलतोस...आराम कर न जरा! सगळ आजचं बोलणार का? " और पानी पीने का बहाना कर, उसकी ऒर पीठ कर, मुँह घुमा कर खड़ी हो गई... वह जानती थी.. यें आँसू कब दगा देंगे, पता नहीं...पल में सारे राज खोल देंगे बेईमान!
मुश्किल से उसने पलकों में इकठ्ठा हुए मोतियों को थामे रक्खा और वाशरूम में चली गई...
चेहरे को ठन्डे पानी से धो कर वह बाहर आई..लेकिन वज्र से आँखें चुरा रही थी वह... उसे पता था उसका बचपन का दोस्त उसका चेहरा पढ़ने में माहिर है.. खास कर उसकी मछली सी आँखें..तभी उसके फ़ोन की रिंग टोन बजी...' हर घड़ी बदल रही हैं धूप ज़िन्दगी...सुनते ही वज्र बोल पड़ा... माय फेवरेट डिअर...
"अब चलती हूँ वज्र..डॉक्टर की अपॉइंटमेंट हैं...कल फिर आऊँगी.. वादा रहा...माय लव!" वैदेही के शब्द उसके मस्तिष्क में रात भर गुंजते रहे थे अवचेतन मन में गुंजती मन्दिर के घण्टानाद से! न जानें उसमें जीवन के कितने उम्मीदों के सुर छुपे हुएं थे!
स्वरचित तथा मौलिक,
द्वारा कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई
अगला भाग अगले अंक में..