हरियाली धरती...
माँ शारदे को नमन! 
विषय : हरियाली।
विधा: चौपाई छन्द।


ऋतु सावन की देखो आई।
खुशियों के घट भर-भर लाई।।
।घिर-घिर आई कारी बदरी।
खग-गण गाएं मीठी कजरी।।

खेतों में हरियाली छाएं।
राग-रागिनी कोयल गाएं।।
रस बरसाता मधुमय अंबर।
बूँद-बूँद में बसते शंकर।।

जग अधीर है हर्षित कंकर।
सृष्टि मात का अनुपम मंतर।।
हिमशिखरों पर देव विराजित।
जग आनंदित क्लेश पराजित।।

शिव शंकर बहु भोले-भाले।
लिप भभूति तन संकट टाले।।
गौरी-शम्भू कैलाशी साजे।
गंग जटा में डमरू बाजे।।

नाचत-नाचत चाले भोले।
तांडव देख खल-हिय डोले।
नीलकंठ जग तारणहारे।
भूत-प्रेत सब शशिधर प्यारे।।

सुख-निनाद की जयणा करती।
दीन-दुखी जन पीड़ा हरती।।
सृष्टि तारिणी जननी धरती।
नित हरियाली कावड़ भरती।।

स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।
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