शीर्षक : संघर्ष....
ऊँची अट्टालिकाओं से स्पर्धा करते पेड़,
देते जन-गण को उर्ध्व-गमन का सन्देश!
अम्बर छूने को आतुर परिंदों की उड़ान ,
रोक सके न कंटिली झाड़ियों की मेढ़!
कहीं फल-फूल लदी हरी वृक्ष-वल्लियाँ,
कहीं बौने पौधे, कहीं ठूँठ, घनी डालियाँ !
संघर्ष बिना सफलता है सिर्फ दिवास्वप्न,
ज़िद्द-जीवट-जिजीविषा साकार करे स्वप्न!
पतझड़ में सूखे पत्ते भले तोड़ दे नाता,
ठूँठ पर खिले कोंपले जब सावन आता!
परिवर्तन प्रकृति चक्र, धूप-छाँव बदलाव!
हर रात के अंतस में छुपा सृजन का भाव!
उबड़-खाबड़, पथरीली धरा या हो उपवन,
ऊंच-नीच भेद नहीं, सब का भरण-पोषण!
जीवन सफ़र सुहाना पथिक करो विश्राम,
जग पल-दो-पल का ठौर-ठिकाना, न स्थाई धाम!
स्वरचित एवं मौलिक,
द्वारा कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई, महाराष्ट्र!