विजयादशमी!

"विजयादशमी"

 

फेंक दो तम की मटमैली चादर,

खुशियों की भर लाओ गागर!

विजय सूर्य के स्वागत पथ पर,

उंडेल दो अमृत कलश भर-भर!

 

शुक्ल-दशमी का सुनहरा सूरज,

आश्विन मास में खिले नव पंकज!

उल्हास, उमंग का सौरभ चहुंओर,

हर्षित, पुलकित धरती का हर छोर!

 

विजयोत्सव की मधुमय, पावन बेला,

सकल चराचर में खुशियों का मेला!

दुःख-दर्द, दमन का ख़त्म हुआ खेला!

विजयादशमी का उत्सव अलबेला!

 

अधर्म पर धर्म की जय-जयकार दशहरा,

अनीति पर नीति-विजय-हुंकार दशहरा!सिया, राम, लखन, विजयरथ पर सवार,

लौटे अयोध्या कर महाबली रावण संहार!

 

क्रांत-भ्राँत जब देव, पाताल, पृथ्वी लोक! धर दुर्गा रूप, जगत जननी दिपाए लोक!अठारह कर शास्त्र-शस्त्र धारिणी, करे गर्जन!

अधम, अक्षम्य, असुर, महिषासुर का करे मर्दन!

 

सुन "गीता ज्ञान" सारथी श्रीकृष्ण सुदर्शन से,

धर्म रक्षणार्थ युग युग में खींची प्रत्यंचा अर्जुन धनुर्धर ने!

कर समूल नाश अधर्मी कौरवों का, महाभारत में,  

फहराई धर्मध्वजा तीनों लोक, सकल चराचर में!

 

विजयादशमी, जश्न त्याग के केसरिया रंग का!

शृंगार बुराई पर अच्छाई के धवल अंग का!

युग युग में धर्म-अधर्म के बीच छिड़े जंग का!

उत्सव उमंग, उल्हास, ऊर्जा के उज्वल संग का!

 

स्वरचित तथा मौलिक:

द्वारा कुसुम अशोक सुराणा, पवई, मुंबई, महाराष्ट्र

 

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