रश्मि के मानस सागर में उठती सुनामी की ऊँची लहरों का अंदाजा माँ को आ चूका था... उसे सिर्फ यहीं फ़िक्र थी कि कहीं यह सुनामी उसकी बच्ची की कोमल भावनाओं को निर्दयता से लील न ले! वह मन में ही बुदबूदाई, "लड़का तो बड़ा होनहार, अच्छे घर का लग रहा है ... रश्मि फाटक से अंदर नहीं आई तब तक वह वहीं बाइक रोक कर खड़ा था!"माँ की बालों की सफ़ेदी और जौहरी सी पारखी नज़र ने मुआयाना कर लिया था... भविष्य के गर्त में छुपे लम्हों का!
रश्मि के एकलौते मामा की बेटी की शादी थी और वह उसमें शरीक होने में असमर्थ थी! उसकी परीक्षा का टाइमटेबल आ चूका था और जिस दिन उसकी ममेरी बहन की शादी थी उसी दिन उसका अकाउंटेंसी का पेपर था! उसने मुम्बई के लिए माँ की टिकट बुक कर ली थी वातानुकूलित बस में!
रश्मि और शौर्य ने अपना ध्यान पढ़ाई पर केंद्रित कर दिया था! शौर्य को भारतीय सेना में ही अपनी किस्मत आजमानी थी! उसने कंप्यूटर तथा इंटरनेट के क्षेत्र में भी अच्छा-खासा ज्ञान प्राप्त कर लिया था! किसी भी साफ्टवेयर सिस्टम को क्रैक करने में उसे महारत हासिल थी! उसका एक ही लक्ष्य था देश के लिए जीना-मरना और आतंकियों से अपने पिता की मौत का बदला लेकर बरसों से सीने में धधकते ज्वालामुखी से क्षोभ का लावा उंडेल बाहर फेंकना! माँ को अकेली छोड़ कर यूँही नहीं आया था वो सुदूर गाँव में! रश्मि भी उसके सपने को भरपूर खाद-पानी दे रही थी!
कहते है प्यार अंधा होता है लेकिन यहाँ तो प्यार ने एक-दूजे की आँखों को नए सपने, नई रोशनी, सोचने-समझने का नया तरीका दे दिया था! वह जानती थी लक्ष्य को पाने के लिए कड़ी मेहनत, सतत प्रयास और दृढ़ निश्चय जरुरी होता है! दोनों अथक परिश्रम में जुटे थे! प्यार की चंचल, उन्मक्त नदी पहाड़ों की चोटियों से उतर कर समतल अँचल में अद्भुत ठहराव लिए बह रही थी! सतह पर खड़े-खड़े जब भी वे पानी में झांकने की कोशिश करते, दोनों के अक्स एक-दूजे में समाये नज़र आते!
बसंत ने दस्तक दे दी थी और फ़ाग की नटखट पुरवाई युवाओं के गालों पर थपकियाँ दे उन्हें होली की याद दिला रही थी! होली का त्यौहार हो और दो दिल न मिलें, यह कैसे संभव था?
सूरज ने जब अपनी सुनहरी किरणों से पृथ्वीवासियों पर रंग उंडेलना शुरू किया तब तक दोस्तों की पूरी टोली रश्मि को सप्तरंगों से सराबोर कर साथ ले जा चुकी थी! शौर्य को भी उसके दोस्त जबरदस्ती ले आएं थे गाँव के मुख्य बाज़ार के चौक में! एक सामाजिक तथा सांस्कृतिक संगठन ने बटाटा वडा, समोसे और ठण्डाई का इंतज़ाम किया था! मस्ती भरें गाने और ढ़ोल-मृदंग के ताल पर युवाओं की टोलियाँ नाच रही थी.. ऊपर से पानी की फुहारें बरस रही थी और सभी रेन-डांस में मस्त थे.. फिर रश्मि और शौर्य कैसे पीछे रहते? किसी ने 'होली है भई... होली है..बुरा न मानों होली है ' कहते-कहते ठण्डाई में कब भाँग मिला दी...किसी को पता ही नहीं चला!
ठण्डाई रश्मि को बहुत पसंद थी! गर्मियों में सील-बट्टे पर मसाला पीस कर ठण्डाई माँ बनाती ही रहती थी! एक-दो पीतल के बड़े ग्लास तो रश्मि ऐसे ही गटक लेती थी! शौर्य के साथ नाचते-गाते वह न जाने कितने ग्लास गटक चुकी थी....उसे न तो दुनियादारी का भान था न खुद की फ़िक्र.. मानों सब भार शौर्य पर डाल कर वह निर्धास्त हो चुकी थी...
साँझ धीरे-धीरे ढल रही थी...खिड़की के परदें हवाओं के साथ-साथ नर्तन कर रहें थे..धुंधली आँखों से जब उसने खुद को शौर्य की बाहों में देखा तो वह फिर झूठमूठ आँखें बंद कर सो गई.. शौर्य के जादुई स्पर्श का नशा रश्मि के दिलोंदिमाग पर चढ़ कर बोल रहा था और वह अधीर हो उसे निमंत्रित कर रही थी मानों नदी सागर को मिलने को उतावली हो रही थी ...
शौर्य ने उसे बाहों में भर लिया! दो दिलों का मिलन तो पहले ही हो चूका था अब दो ज़िस्म भी एक-दूजे में समा चुके थे! शौर्य ने दो मग भर कर गरमागरम नेस कॉफ़ी बनाई और एक मग रश्मि के हाथ में थमा कर उसके साथ कॉफ़ी की चुस्कियों का मजा लेने लगा!
जैसे ही उसकी नज़र दीवार पर टंगी घड़ी पर पड़ी वह टी-शर्ट पहनने लगा... "चलो! तुम्हें घर छोड़ आता हूँ! माँ तुम्हारा इंतज़ार कर रही होगी".. लड़खड़ाती जुबान से रश्मि बोल पड़ी "यार! बैठो न दो पल पास में... माँ पड़ोस के गाँव गई हुई है...कुछ कचहरी का काम था...कल रात को आएगी! क्या करुँगी अकेली घर जा कर... आज यहीं रुक जाती हूँ... ओ के हैंडसम!" शौर्य आगे क्या कहता?
अब तक दोपहर के नाश्ते का खुमार उतर चूका था और पेट में चूहें कबड्डी खेल रहें थे! वह होटल से खाना ले आया... दोनों खाने पर टूट पड़े... 'थका तन, तृप्त मन और स्वादिष्ट भोजन.. मजा आ गया यार... चलो! हो जाएं एक जाम, प्यार के नाम..." रश्मि शौर्य के गले पड़ फिर बोल पड़ी....
स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।
शेष अगले भाग में...