जीवन दीप!
दूरदर्शन पर पद्म पुरस्कार अलंकरण समारोह का थेट प्रक्षेपण हो रहा था! सब्जी काटते-काटते मैं कार्यक्रम देख रही थी! तभी एक नाम पुकारा गया! "सुश्री प्रिया परुलेकर, महाराष्ट्र, महिला सशक्तिकरण तथा देवदासी पुनरुत्थान के क्षेत्र में सराहनीय कार्य के लिए पद्म भूषण पुरस्कार से उन्हें अलंकृत किया जा रहा हैं... कृपया तालियों की गड़गडाहट से उनका स्वागत कीजिए!" 
कृश काय,शर्मीली पियु को देख मैं दंग रह गई! शालेय जीवन की मेरी प्रिय सखी प्रिया आज सफलता, प्रसिद्धि के उतुंग शिखर पर खड़ी थी जहां से हर मुकाम अदना सा प्रतीत हो रहा था! सादगी से भरा उसका व्यक्तित्व, विनम्रता, उपस्थित अतिथियों तथा राष्ट्रपति महोदया को अभिवादन करने की उसकी अदा पर मानों सारा दालन फ़िदा हो गया था! हलकी सी मुस्कुराहट की जगमग में छायाचित्रकार ने उन लम्हों को कैमरे में कैद कर लिया सदा के लिए!

स्मृतियाँ भी कैसी चंचल होती हैं नन्हे बालक सी! कब विस्मृति की ओट में छुप जाती हैं और कब अंजुरी में छुपा चेहरा आगे कर मुस्कुराने लगती हैं, पता ही नहीं चलता!
मेरे अंतस के फलक पर सालों पुराना सिनेमागृह पर टंगा 'पड़ोसन' फ़िल्म का पोस्टर सजीव हो उठा! हम दोनों सखियाँ उस फ़िल्म को देखने तो चली गई मगर काले बाजार में बिकती टिकीटों को देख हम उदास हो गई! न जेब में ज्यादा सिक्के थे न ज्यादा खाली समय! पियु ने कहा, " कोई बात नहीं सुमी! मेरा घर नजदीक ही है! चलो! कुछ देर रुक जाओ... कांदा-पोहे खा कर फिर चली जाना!"
निराश मन को कांदा-पोहे के काल्पनिक महक से ही ताजगी मिल गई! मैं उसके साथ-साथ चलने लगी भरी दोपहरी में साये की तरह! छुईमुई सी मैं आसपास का माहौल देख  असहज महसूस कर रही थी! 'यह तो 'रेड लाइट एरिया' लग रहा है, किसी फ़िल्म के दृश्य सा!' मई मन ही मन बुदबुदायी! मुझे सकपकाया हुआ देख वह बोली, "सुमी! बिनधास्त चल! इस मोहल्ले में किसी की हिम्मत नहीं है हमें ताड़ने की भी! हमारी चिन्नमा का इलाका है! बहुत मानती है वो मेरी माँ को!"
मैं अवाक रह गई! 
मन में उठा विचारों का बवंडर शांत हो चुका था! एक संकरी गली से हम गोबर से लिपे आँगन में पहुँच गए थे! पियु की माँ ने हमें गुड़ से बनी नीम्बू की शिकंजी दी!
सूरज की वक्रदृष्टी अब ममता की छाँव में तब्दील हो चुकी थी! माँ के हाथों से बने कांदा-पोहे का स्वाद अभी रसना पर था और 'रसना' का छोटा सा प्याला हाथ में! फिर क्या था...सारी थकान छूमंतर! 
झील की गहराइयों सा पियु के घरवालों का निस्वार्थ प्यार मुझे बार-बार उनकी ओर खींच रहा था चुम्बक सा ! अभावों में भी ख़ुशी-ख़ुशी जीने का फंडा सीखा गया था मिट्टी- गोबर से लीपा-पुता पियु का घर-परिवार! साथ-साथ पढ़ना-लिखना, घूमना-बतियाना, हँसना-खिलखिलाना दोस्ती के रेशमी धागों को मजबूती दे रहा था!
टिमटीमाती नन्ही दीवेली की रोशनी में पढ़ना-लिखना, ट्रांझीस्टर पर गाने लगा कर भूमिति के प्रमेयों, निबंध तथा बड़े-बड़े सवालों की पहेलियों को चंद मिनटों में सुलझाना आम बात हो चुकी थी! मैं पियु के जीवट,जद्दोजहद,जिगर की कायल हो चुकी थी!
वक़्त की मार से एक संपन्न परिवार दाने-दाने को मोहताज हो चूका था मगर रस्सी जल गई थी पर बल नहीं गया था! आपदाओं में भी दिल की अमीरी कायम थी! वैद्यराज पिता की जुए की लत ने परिवार के मुँह का निवाला तो छीन लिया था मगर दर्यादिली को कैसे छीन पाता कम्बख्त जमाना? एक रोटी के चार टुकड़े कर, ले-बाँट कर खाने का हुनर आज भी जिन्दा था! पड़ोस की देवदासी चिन्नमा इसी की तो कायल थी! सुमी के परिवार ने कभी उसे दुत्कारा नहीं बल्कि जब वह पेट से थी तो उसे पौष्टिक खाना खिलाती थी पियु की माँ! पियु के पिताजी नामी वैद्य थे तो इक्का-दुक्का बीमारी में चिन्नमा उन्ही से दवाई लेती! वक़्त की मजबूरियों ने उसे वैश्यावृत्ति में धकेल दिया था मगर इस परिवार के लिए वह सुरक्षा-ढाल थी! मजाल है कि कोई पियु की तरफ आँख उठा कर भी देखे!

वक़्त के पांसे पलटते गए! मेरे पिताजी की ट्रांसफर हो गई और हम कराड चले गए! मैं वाणिज्य शाखा में स्नातक की पदवी प्राप्त कर चुकी थी और अपनी गृहस्थी में रच-बस गई थी और पियु समाजशास्त्र में स्नातकोत्तर डिग्री लेकर समाजसेवा में समर्पित हो चुकी थी! दहेज़ का दानव पियु के सपनों की कोमल कोंपलों को निगल चूका था मगर पियु टूटी नहीं बल्कि वक़्त के घाँवों को सह कर फौलाद सी मजबूत हो चुकी थी! उसने समाज सेवा के यज्ञ में खुद को समिधा स्वरूप अर्पित करने का प्रण ले लिया था!

माँ-पिताजी का साया पियु के सिर से उठ चुका था और चिन्नामा ही उसकी अभिभावक थी! दुनिया की नजरों में वह वेश्या थी मगर पियु के लिए माँ की कमी पूरी करती मौसी!
उम्र के साथ-साथ चिन्नमा का स्वास्थ्य बिगड़ रहा था! एड्स की भयंकर बीमारी ने उसे अपनी गिरफ्त में ले लिया था! उसकी छटपटाहट, लाचारी ने पियु को काली घटाओं के बिच कड़कती-चमकती दामिनी के दर्शन करा दिए और वह समाज के इस उपेक्षित हिस्से के लिए  जीवन-रेखा बन गई! पियु ने 'रेड लाइट एरिया' को ही अपना कार्यक्षेत्र बना दिया था!
एचआयवी/एड्स से पीड़ित लोगों के लिए, खासकर सभ्य समाज से तिरस्कृत इन देवदासियों के लिए वह उम्मीदों की किरण बन कर उभर आई थी! नियमित रूप से पीड़ित को मनोचिकित्सक कि सलाह, मानस-उपचार, उचित मूल्य में दवाईयां, टेस्ट की सेवाएं उपलब्ध कराना, सरकारी अस्पतालों में उनका पंजीकरण कराना, मुफ्त सलाह तथा इलाज मुहय्या कराना उसका युद्धस्तरीय मिशन बन चूका था!
वो मासूम बच्चे जिनकी खैर-खबर लेनेवाला कोई नहीं था, जो जन्म से ही माँ से बीमारी की सौगात ले इस बेदर्द दुनिया में कदम रख चुके थे, उन्हें दवा-दारू उपलब्ध कराना, शिक्षा दीक्षा देना, जीने की उम्मीद जगाना उसकी दिनचर्या का हिस्सा बन चुका था!
साफ-दिल, भोले-भाले माता-पिता के आशीर्वाद से कहो या चिन्नमा के मुख से दिन-रात निकलती दुआओं से कहो या पीड़ित, समाज से प्रताड़ित देवदासियों की प्रार्थना की बदौलत ही मानों पियु के जीवन में सफलता का तेजोमय सूर्य उदित हो चुका था!
स्नेह की चाह में खुद जल कर दूसरों को रोशनी देता मिट्टी का नन्हा दिया अब क्रांति की मशाल में परिवर्तित हो चुका था! देश-विदेश में उसके त्याग-समर्पण तथा अथक प्रामाणिक प्रयासों के चर्चे थे! अंधकार को चुनौती दे रहा था एक अदना सा मिट्टी का दीया! खुद अपने मन के किसी कोने में अपने अरमानों की चिता जला कर, ह्रदय तले अंधेरा छुपा कर प्रिया, मेरी प्यारी पियु दूसरों को रोशनी बाँट रहा थी! हर पल फड़फड़ाते दीप को हथेलियों से सहारा दे कर, उदास बाती को स्नेह से भिगो कर, दुनिया को अलविदा कहने से पहले नया जीवन दीप जला रही थी!

स्वरचित तथा मौलिक 
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई |

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