किशोर छन्द...
थाम तिरंगा खड़ी विश्व में, नारी है।
भारत की बेटी का जलवा, भारी है।
अबला कहने वाले हारें, यारी है।
दुश्मन की बन काल नहीं रण, हारी है।।
सिंह सवारी करती दुर्गा, आयी है।
जगत मनुज हित सारी खुशियाँ, लायी है।
अनुपम सुन्दर छवि माँ की बहु, भायी है।
जन गण मन के दिल में मैया, छायी है।।
आधी आबादी का चेतन, जागा है।
दुश्मन कायर दूम दबा कर, भागा है।
गहरा दिल पर घाँव बहुत ही, लागा है।
धर्म बता कर बम 'सिंदूरी', दागा है।।
धरा गगन या अंतरिक्ष हो, गौरा है।
शौर्य, वीरता, त्याग दान का, औरा है।
व्याकुल अतिशय दंश दे रहा, भौंरा है।
फिर भी मन उपवन में किसलय, बौरा है।।
जननी जग की वंदनीय है, माना जी।
झुकती दुनिया जिसके आगे, जाना जी।
झुक जीजाई, पन्ना आगे, आना जी।
सदा दुआओं को तुम माँ से, पाना जी।।
स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुंबई।