रंग बदलती कोकिला ...

#विषय लघु कथा 
जैसी करनी वैसी भरनी 
#दिनांक 24/12/25

कुछ ही महिनों पहले ,दिल्ली से बम्बई स्थानांतरित हुई धनवान कोकिला अपनी चार अन्य सहेलियों के साथ मिलकर अपने नज़दीकी  रिश्तेदार व अपनी  सहेली रोमा को देखने गयी।
दरअसल रोमा बड़े  ही गंभीर रोग पार्किसंस से ग्रस्त थी, और पलंग पर पड़ी कराह रही थी, खाना वाना भी नहीं  खा पा रही थी, और असह्य दर्द झेल रही थी। कठोर से कठोर दिल भी पसिज‌ जाय ,ऐसा दर्द था रोमा को ।

रंग बदलती कोकिला का  अपने मूल स्वभाव से दरअसल देखें तो  बहुत  ही चालाक, चतुर  मुॅंहफट और बड़ी ही बतमिज औरत थी, चालाक कोकिला, रोमा की हालात को देखने पर ,सबके सुनते तो ,कुछ नहीं बोली,सबके सामने तो रोमा को, निढाल होकर सांत्वना और संबल देती रही, 

चतुर कोकिला रोमा के पति को बड़ी चतुराई से कहने लगी कि, "भगवान की दया से सब ठीक हो जाएगा", 'चिंता बिल्कुल नहीं  करना" , "कुछ काम हो तो  जरूर बोलना",आदि आदि।

कोकिला रोमा के घर से ज्योंहि सीढ़ियां उतरी और बाहर निकल ते ही अपनी सहेलियों के बीच,  
बीमार रोमा के लिए मुॅंहफट कोकिला तपाक से बोली 

"जैसी करनी वैसी भरनी" 
भाई ईश्वर किसीको नहीं छोड़ता, सब यहीं तो भुगतना है, करे कराए का फल तो भोगना ही पड़ता है , उसके लहजे में दार्शनिकता नहीं बल्कि,रोमा के प्रति द्वेष व पूर्वाग्रह साफ झलक रहा था ।

फिर तो चारों सहेलियों ने कोकिला को बारी बारी से आड़े हाथ लिया, , एक सहेली:कि तू कितनी बदतमीज व संवेदनहीन औरत हो? ऐसी कैसी  सहेली हो ? दूसरी सहेली:तुझे शर्म नहीं आती अपने रिश्तेदार, उसमें  भी अपनी सहेली के लिए ऐसी वैसी,बातें करते हुए । कोई दुश्मन के लिए भी ऐसी बातें करें तो शोभा नहीं देता,

तीसरी सहेली : तू वहाॅं होशियार बन रही थी , बड़ी गंभीरता से सांत्वना और संबल दे रही थी।
कोकिला तुम ऐसी हो यह तो तेरे चेहरे मोहरे से पता चल रहा था, पर इतनी गयी गुजरी हो यह आज पता चला,

फिर सभी सहेलियां एक सुर में:कौन विश्वास करेगा तुम जैसी  बेहुदा औरत पर ,  और देख, रोमा को तुमसे अच्छा हम जानते हैं , उसकी तुम्हारें  जैसे ,फालतू परिवार से नहीं पटी तो इसमें उसका क्या दोष?
तू जा अपने घर, हम सभी बस में चली जाएंगी और आइन्दा हमारे साथ तो क्या, तुम नजदीक भी मत फटकना।

लघुकथा: अशोक दोशी
इस पर लोग क्या कह रहे हैं