महंगाई की मार, आम आदमी बेजार डस गई है नागिन, मची चीख-पुकार।
महंगाई की मार, आम आदमी बेजार।।

अन्नदाता के पीठ पर, पड़ी कोड़ों की मार।
हालात के आगे, कृषक ने मानी हार।। 
कोविड की महामारी, कर गई प्रहार।
प्रकृति से छेड़खानी, छीन गई बहार।।

मुद्रास्फीति अजगर, निगल गया संसार।
महंगाई की मार, आम आदमी बेजार।

अहंकार का मारा, नेता-अभिनेता न्यारा।
विश्व झोंक युद्ध में, तमाशाई बना प्यारा।
दुनिया का चौधरी, ले हथियारों का भारा।
ठेकेदारी चमकाता, फिरे है मारा-मारा।।

तेल की कमी से त्रस्त, दुनिया है लाचार।
महंगाई की मार, आम आदमी बेजार।।

युद्ध की विभीषिका, संसाधन थे अपार।
स्वाहा: किएं मनु ने, पैरों पर कुल्हाड़ी मार।
जलते शहर, जलते देह, मानवता की हार।
इस रात की नहीं सुबह, चहुँओर अंधकार।

लाशों के ढ़ेर पर, महाशक्तियाँ करें व्यापार।
महंगाई की मार, आम आदमी बेजार।।

कैसी मानसिकता, कैसा है यह भण्डार।
विकास के नाम पर, विनाश के औजार।
ड्रोन, मिसाईल, बम, आधुनिक हैं हथियार।
इंसानियत की कब्र पर, सजे 'कुसुम' बार-बार।।

दम्भ-लोभ का असुर, मारे नित षटकार।
महंगाई की मार, आम आदमी बेजार।।

स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।

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