राग पुष्प सुंदर मय धरती
नव पत कोमल प्रकाशित करती
शीतलहर के आ जाने से
ओस की बूंदे श्रृंगारित करती...
मोती सा बूंदों का घेरा
भोर हुयी फिर हुआ सबेरा
ओझल होते दृश्य मधुर को
मानस पटल पर है उकेरा...
शीतलता नयनों में भरती
व्यंग्य-विकार को दूर है करती
उलझन भरे इस जीवन को
तरोताजा यह रोज है करती...
सूरज की किरणों में चमके
इंद्रधनुष के रंग है बिखरे
ठण्ड भरे इस मौसम में
लोगों के है चेहरे निखरे...
प्रकृति के है बहुत करिश्में
कभी तो घर से निकलो अपने
सुबह की सैर करो जी भर
स्वस्थ रखो इस मन को अपने...