दर्द-ए-बेवफ़ा, कुछ वफ़ा भी तो कीजिये,
मायूसियों को खुशनुमा तोहफ़ा दीजिये!
डगमगाते कदमों को बाँहों में थाम लीजिये,
उम्मीदों का जलवा-ए-चिराग जला दीजिये!
जिन्दगी का जाम घूंट-घूंट पी मजा लीजिये,
अश्क़ कहकहों में बदलना सीख लीजिये!
कारी घटाओं में छुपी जीवन-सुधा पी लीजिये,
गुलाबी अधरों को यौवन-हाला से मदमस्त कीजिये!
भरी दोपहरी में आग उगलते पलाश बिन लीजिये!
लाल-केसरी फूलों सी जिन्दगी को जी लीजिये!
झूठे वादे पे वादे कर न वफ़ा से बेवफाई कीजिये,
कांटों पें मुस्कुरातें गुलों को यूँ न शर्मशार कीजिये!
उम्मीदों के टूटे पत्तों को न हवा में उड़ा दीजिये,
मलबे तले दबे-कुचले अरमानों को न दफ़न कीजिये!
वक़्त बदलता हैं मिजाज़, वफ़ादारी से फ़र्ज अदा कीजिये,
बेरहम यारा! औरों के कर्ज भी जिंदगी में अदा कीजिये!
रसपान कर भँवरा चल पड़ा अज़नबी राह पर,
चांदनी में थका-हारा तन कराहता रहा रात भर!
चंपा-चमेली सेज़ पर महकती रहीं रात भर,
सेज़ की सलवटें अश्कों में भीगती रहीं रात भर!
दर्द-ए-बेवफ़ा! बेमानी है चाहत टूटें तारों से,
पत्थर दिल क्या जानें मायने धधगते अँगारों के!
दर्द का कड़वा जाम छलकता रहा ठहराव भूल!
बेवफ़ा! बेरहम अक्स झिलमिलता रहा वादें भूल!
शमा पिघलती रहीं रात भर पतंगे की याद में,
पतंगा नौ दो ग्यारह हुआ नूर-ए-हुस्न के हाट में!
बेदर्दी! फासले बहुत कम थे जिन्दगी-मौत के दरमियां,
छटपटाता रहा दिल तेरी बेवफाइयों की महफ़िल में!
स्वरचित तथा मौलिक
द्वारा कुसुम अशोक सुराणा, मुंबई, महाराष्ट्र|