दाम्पत्य जीवन..

दाम्पत्य जीवन की पराकाष्ठा यहीं कि जी रहे है हम!

शीशे के बिखरें टुकड़ों को समेट अश्क़ पी रहे है हम!

 

चाँद-सितारों की महफ़िल में अँधेरे निगल रहे है हम! 

कतरा-कतरा रोशनी के लिए मर-मर जी रहे है हम!

 

खिलौनों से खेलना शौक फिर भी ख़्वाब बुन रहे हैं हम!

जिस्म से प्यार जिन्हें उन पर हो कुर्बान मुस्कुरा रहे है हम! 

 

छोटी सी ज़िन्दगी में उम्र के ढलान पर फिस्सड़ी रहे है हम!

अतीत के मलबे तले दबी उम्मीदों के नशेडी रहे है हम!

 

किससे करें गिले-शिकवे, किसके मत्थे दोष मढ़ रहे है हम?

किसके लिए आँगन में बिखरे पारिजात चुन रहे है हम?

 

ज़िन्दगी का जाम जो छलक रहा था बार- बार पी रहे है हम!

बची-खुची मय प्याले में उसी की खुमारी में जी रहे है हम! 

 

ज़िन्दगी-मौत का भरोसा करें कैसे? उलझ रहे है हम!

कल रहें या न रहें यहाँ, ज़िन्दगी तेरे नखरे उठा रहे है हम!

 

लड़खड़ाते कदम, लड़खड़ाते विश्वास को थाम रहे है हम!

बच्चों के कोमल कंधों को मजबूत सेतु बना रहे है हम!

 

रिश्ते के महीन रेशम धागों को सब्र से बल दे रहे है हम!

वक़्त की कठोर बेंत की मार सहन कर 

भविष्य गढ़ रहे हम!

 

स्वरचित एवं मौलिक,

कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई , महाराष्ट्र 

 

 

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