तेरी चाहत यह मुकाम दे गई...

          ऑफिस के लिए निकलते हुए शशांक ने मेरे गालों पर एक प्यारा-सा चुंबन अंकित कर दिया। उनके प्यार भरे छुअन से मेरे सम्पूर्ण बदन में एक सिहरन की लहर दौड़ गई। प्रत्युत्तर में मैंने भी अपनी काली और बड़ी-बड़ी नैनों के तीर से उस पर वार कर दिया था। वक्त की अनुपयुक्तता को भाँपते हुए वे चेहरे पर एक प्यारी-सी मुस्कान बिखेरकर सीधे बाहर की ओर चल दिए।

          सामने गाड़ी लगी हुई थी। शशांक साहब को देखते ही सुरक्षा गार्ड एवं ड्राईवर तुरंत हरकत में आ गए। गाड़ी का दरवाजा खुला, वे अंदर दाखिल हुए और गाड़ी आगे की ओर सरकती हुई निकल गई। गाड़ी आँखों से ओझल होते ही मैं वापस अंदर चली आई।

          हाल ही में शशांक की पोस्टिंग जमशेदपुर में जिला कलेक्टर के रूप में हुई थी और पिछले माह ही हमलोग आकर सरकारी बंगले में शिफ्ट हुए थे । घर में सबकुछ पूरी तरह से सेट नहीं हुआ था। कई सारे सामान अभी भी पैक्ड ही थे । मेरा पाँव ड्राइंग रूम की ओर बढ़ गया । वहाँ रखे बुकशेल्फ पर एक सरसरी नज़र डाली। सहसा एक किताब पर जाकर नज़र अटक गई । उस किताब का शीर्षक था – ‘तेरी चाहत यह मुकाम दे गई।’ अचानक स्मरण हो आया कि यह तो वही किताब है जिसे मेरी सहेली निकिता ने लिखी है और वह एक दिन बड़े प्यार से मुझे भेंट कर गई थी। चलो आज इसी को पढ़ लेती हूँ। मन-ही-मन बुदबुदाते हुए मैं सोफ़े पर जा धँसी और उसे पढ़ने लगी।

          कहानी आरभ होती है - फरवरी का महिना था। कड़ाके की ठंड थी। निशा के पापा छुट्टी पर आए हुए थे। झटपट योजना बनी और पापा उसे सपरिवार शिमला घुमाने ले गए। उन दिनों वहाँ बर्फ़बारी खूब हो रही थी। सैलानियों का जमावड़ा लगा हुआ था। वे लोग शाम को होटल पहुंचे। रातभर आराम फरमाने के बाद सुबह बर्फ़बारी का आनंद लेने सीधे टट्टुओं पर सवार होकर कुफ़री पहुँच गए। वहाँ का नजारा अद्भुत था। पल-पल बदलते मौसम का अद्भुत आनंद मिल रहा था। कभी आसमान में कोहरा-सा घिर आता और अंधेरा छा जाता। कभी बर्फ के छोटे-छोटे दाने आसमान से बरसने लगते तो कभी सूरज चमक उठता और दूर-दूर तक बिखरी बर्फ की चादर चाँदी की तरह चमक उठती। ऐसा अद्भुत नज़ारा देख मन आह्लादित होकर झूम उठता।

          बर्फ़ के साथ खेलते हुए निशा ढलान में थोड़े नीचे की ओर चली गई। पता नहीं कैसे अचानक उसका पाँव फिसला और वह बर्फ़ के ऊपर गोल-गोल घूमती हुई नीचे की ओर लुढ़कने लगी। वह बहुत घबरा गई और घबराहट के कारण मुख से अनायास चीख भी निकलने लगी । उसी समय एक लड़का बड़ी फुर्ती के साथ आगे की ओर लपका और उसे सहारा देकर रोक लिया। निशा उसकी बाँहों में अचानक आ समाई। सिर से गर्म ऊनी टोपी गिर चुकी थी। बाल बिखर चुके थे। लड़का उनकी आँखों में एकटक देखे जा रहा था। आँखें कुछ जानी पहचानी-सी लग रही थी। परंतु, अगले ही क्षण उसे अपनी स्थिति का भान हुआ और एक झटके में वह उस लड़के की पकड़ से अलग होकर दूर जा खड़ी हुई। सहारा देने के लिए उस लड़के को धन्यवाद कहा और सीधे ऊपर की ओर चढ़ने लगी।

          ऊपर चढ़ने के क्रम में उसे आभास हुआ कि कोई उसके पीछे-पीछे आ रहा है। मुड़कर देखा तो वही लड़का उसके पीछे-पीछे आ रहा था। वह फिर चुपचाप ऊपर की ओर बढ़ने लगी। वह लड़का भी ठीक उसके पीछे-पीछे ऊपर आ रहा था। दोनों में कोई बातचीत नहीं, परंतु निशा के मन में कुछ सवाल जरूर उभर आए थे उस लड़के को लेकर।

          ऊपर आते ही पापा ने उससे घबराकर पूछा – “निशा बेटा! कहाँ चली गई थी तुम? हमलोग कितना घबरा गए थे?

          “कहीं नहीं पापा बस बर्फ में खेलते हुए जरा नीचे की ओर चली गई थी। फिर पता नहीं अचानक मेरा पाँव कैसे फिसल गया और मैं नीचे की ओर लुढ़कने लगी ...”   

          “और मैंने इसे सहारा देकर बचा लिया। है न निशा?” – उसकी बात पूरी होने से पहले ही उस लड़के ने सामने आकर अपनी बात रख दी।  

          पापा ने आँखों के इशारे से ही उससे पूछ लिया – ‘कौन है यह लड़का?

          निशा ने कंधा उचकाकर इशारा कर दिया – ‘मुझे नहीं पता।’

          “कौन हो तुम ?” – पापा ने उस लड़के से सवाल किया।

          “मैं...” वह कुछ बोलने के लिए तैयार हुआ किन्तु, फिर अगले ही क्षण रुक गया और फिर बात बदलते हुए बोला – “अच्छा अंकल! वो छोड़िए पहले ये बताइए कि कैसे हैं आपलोग? और निशा आप कैसी हो?” – उस लड़के का बोलने का लहज़ा कुछ ऐसा था मानो वह वर्षों से निशा और उनके घरवालों को जानते हो।

          “हम तो नहीं पहचानते तुम्हें। निशा! तुमसे परिचित है क्या?” निशा के पापा ने सवाल किया।  

          “नहीं पापा! मैं तो इसे जानती भी नहीं ।” और फिर उस लड़के की ओर मुड़कर निशा बोली - - “मेरी हेल्प करने के लिए वन्स अगैन थैंक्स यू! हो गई न बात ख़तम? अब आप यहाँ से जाइए प्लीज़।”  

          “देखिए, आपलोग गलत न समझे। भले ही आप मुझे नहीं जानते हैं परंतु, मैं आपलोगों को बहुत अच्छी तरह से जानता हूँ। और निशा मेरे लिए बहुत खास है। मेरी प्रेरणा है। आज मैं जो ..............।”

          “ओय हैलो! ज़्यादा बकवास मत करो, समझे न तुम। वक्त पर आकर थोड़ा सहारा क्या दे दिया अपने आप को अक्षय कुमार समझने लगा। यहाँ कोई फ़िल्मी सीन नहीं चल रहा है समझे, होश-हवास में रहकर बात करो, नहीं तो बेकार में मेरे हाथों पीट जाओगे।” - निशा ने बीच में ही टोकते हुए उसे धमकाया।

          “देखिए, आपलोग गलत समझ रहे हैं। मैं कोई ऐसा-वैसा लड़का नहीं हूँ। बड़े इत्तेफाक की बात है कि आपलोग मुझे यहाँ अचानक ही दिख गए। आपकी बेटी, सचमुच मेरा इंस्पेरेशन है और मैं इससे बेहद...।”

          “ओ इडियट! बकवास बंद कर। अनाप-शनाप बके जा रहा है। मेरी बेटी के बारे में एक लफ़्ज़ भी आगे मत बोलना। तुम मुझे जानते नहीं हो। एक फौजी हूँ और अगर दिमाग घूमा तो सीधे गोली से तुम्हारा भेजा उड़ा दूंगा।” – पापा ने बीच में ही उसे टोकते हुए दहाड़ा।

          उसकी हरकत देख निशा भी मन-ही-मन बड़बड़ाई बड़ा बेशर्म इंसान है। मैं इसे जानती तक नहीं और मेरे बारे में कुछ भी बके जा रहा है। ज़्यादा किया तो आज पापा के हाथों जरूर पीटेगा। सारी हीरोगिरी ही निकल जाएगी।

          लड़का मायूस हो गया। आगे भी कुछ कहना चाहता था किन्तु, रुक गया। वहाँ आगे कुछ और बोलना उसे उचित नहीं लगा। जाते-जाते बस इतना कह गया कि एक दिन आपलोगों को अपनी गलती का अहसास जरूर होगा।

          निशा और उनके घरवालों को भी लगा शायद उस लड़के की मानसिक स्थिति सही नहीं है इसीलिए कुछ अनाप-शनाप बोल गया। उसकी कही हुई बातें दिल से निकाल दी गई और वे लोग एक बार फिर घूमने-फिरने में व्यस्त हो गए। कुछ दिन शिमला में रह कर घूमे-फिरे और छुट्टियाँ बिता कर वापस लौट आए।

          शाम का वक्त था। निशा अपने कमरे में कोई कहानी पढ़ रही थी। पढ़ते-पढ़ते न जाने क्यों उसके दृष्टिपटल पर शिमला की वह घटना तैर गई। न चाहते हुए भी वह लड़का बार-बार उसकी यादों में उभरने लगा। बर्फ़ पर लुढ़कना, अचानक उसकी बाहों में पड़ना, सागर-सी गहरी उनकी आँखें, उसकी बातों की दृढ़ता और फिर उसका स्वाभिमानी नेचर। ये सारी चीजें देखकर लग नहीं रहा था कि उस लड़के की मानसिक स्थिति गड़बड़ होगी। इतना ही नहीं, बार-बार वह मुझे बड़ी आत्मीयता के साथ निशा कह रहा था। मेरा नाम आखिरकार उसे कैसे पता? हो सकता है पापा के मुख से मेरा नाम सुन लिया हो। परंतु, हम सभी के साथ उसका इस तरह की आत्मीयता दिखाना कुछ हज़म नहीं हो रहा है। इसी तरह के कई सारे विचार निशा के दिमाग में उसको लेकर उमड़ने-घुमड़ने लगे थे।

          छुट्टियाँ समाप्त हो चुकी थी। निशा स्कूल जाने लगी। वह एक स्कूल में टीचिंग का काम करती थी। स्कूल में बच्चों के बीच उसकी दुनिया एक बार फिर खिलखिलाने लगी। रोज स्कूल जाना, बच्चों के बीच रहना, उन्हें पढ़ाना और फिर घर वापस आकर पठन-पाठन में जुट जाना। यही उसकी दिनचर्या बन गयी थी। वह व्यस्त थी, खुश थी और मस्त थी।  

          घर में दबे स्वर किसी बात को लेकर चर्चा चल रही थी। उस चर्चा में लगभग घर के सारे सदस्य शामिल थे सिवाय निशा के। उससे रहा नहीं गया और बालकनी में खड़ी अपनी मम्मी से पूछ ही लिया – “मम्मी! घर में आजकल दबे स्वर किस बात पर इतनी चर्चा चल रही है?

          “अरे, तुम सुनोगी तो खुशी के मारे पागल हो जाओगी।” - मम्मी ने निशा को दोनों बाहों से झकझोरते हुए कहा।

          “ऐसी आखिर क्या बात है? जरा मैं भी तो सुनूँ।” – निशा ने कहा।

          “तुम्हारी शादी की चर्चा चल रही है। और जानती हो लड़का क्या करता है? इसी साल आईएएस की परीक्षा पास कर वह कलेक्टर बना है।” – मम्मी ने बड़े एक्साइटमेंट के साथ बात कही।

          मम्मी की बात सुनकर निशा का चेहरा न तो खिला और न ही मुरझाया। उसके चेहरे पर एकदम सामान्य सा-भाव था। निशा का ऐसा शिथिल रिएक्शन देखकर मम्मी का जोश ठंडा पड़ गया। बाहों की पकड़ ढीली पड़ गई और धीरे से पूछ बैठी – “क्या हुआ? सुनकर अच्छा नहीं लगा? मुझे तो लगा था कि यह बात सुनकर तुम खुशी के मारे उछल पड़ोगी।”

          “अरे मम्मी! अभी शादी फाइनल नहीं हुई है, जो तुम ऐसी चहक रही हो। जब सबकुछ तय हो जाएगा तो देखा जाएगा।” - निशा ने बड़ी समझदारी से कहा।

          “बात तो तुम्हारी सही है।” - मम्मी ने भी सहमति जताई।

          निशा अपने कमरे में लौट आई । बिस्तर पर लेटे हुए उसे शशांक का ख्याल हो आया। उसी के बारे में वह सोचने लगी। शशांक से उसकी बस एक ही बार मुलाकात हुई थी, वो भी अपनी दीदी की शादी में। बरातियों की भीड़ में एक लड़का उसे लंबे समय से सबसे नजरें बचाकर घूरे जा रहा था । एक बार निशा की नजरें उससे टकरा गई । दोनों की नजरें कुछ देर तक एक –दूसरे से उलझी रही। निशा ने शरमाते हुए अपनी नजरें झुका ली और फिर रात भर चोरी-छिपे एक दूसरे को निहारने का क्रम चलता रहा । सुबह विदाई के समय उस लड़के ने निशा के पास आकर कहा – यू लुक गॉजस ! और दूल्हे के साथ गाड़ी में सवार होकर चला गया। 

          बात तीन साल पहले की है। कल्पना की शादी के दिन दूल्हे बारात सहित उसके द्वार पर आ चुका था। बरातियों की ओर से खूब नाच-गान चल रहा था। दूसरी तरफ लड़कीवालों की ओर से भी लड़कियां खूब ठुमके लगा रही थी। निशा भी उसमें शामिल थी। उसके लटके-झटके देखकर बरातियों ने मानो सरेंडर ही कर दिया था।

          शादी सम्पन्न हुई। कल्पना की विदाई भी हो गई। दो दिन बाद कल्पना अपने पति के साथ मायके प्रणाम-पाती करने आई और फिर उसी दिन ससुराल लौट गई।

          एक सप्ताह बाद कल्पना का फोन आया। मम्मी-पापा से बात करने के बाद वह निशा से बात करने लगी – “क्या बात है निशा! तुमने ऐसा क्या जादू कर दिया है कि यहाँ तुम्हारे चाहनेवालों की एक फ़ौज तैयार हो गई है। एक से एक लड़के हैं। जिसका भी हाथ थाम लो रानी बनकर रहेगी।”   

          “ऐसा है क्या? तब तो अपना भाव ज़रा और बढ़ाना पड़ेगा।” - निशा ने कहा।

          “अरे! भाव तुम क्या बढ़ाओगी। तुम्हारे जीजू ने पहले ही तुम्हारा भाव आसमान चढ़ा दिया है। पता है उस दिन तुम्हारा एक आशिक आया था तुम्हारे जीजू के पास। नाम है उसका शशांक । यह वही लड़का है, जिससे शादी के दिन रात भर तुम्हारा नैन मटका चला था । उसने तुम्हारे जीजू से कहा कि अपनी साली से किसी तरह शादी करवा दीजिए। जिंदगी भर आपका अहसान मानूँगा।” 

          “फ़िर जीजू ने क्या कहा?”

          उन्होंने साफ कह दिया – “मेरी साली की शादी किसी ऐसे-वैसे लड़कों से नहीं बल्कि, किसी कलेक्टर से होगी, समझे। इसीलिए उसका सपना देखना छोड़ दो।”  

          “फिर क्या हुआ?”

          “होना क्या था। अपना-सा मुंह लेकर वह घर चला गया। परंतु बात यहीं खतम नहीं हुई। दो दिन बाद पता चला वह लड़का आईएएस की तैयारी करने के लिए दिल्ली चला गया है।” - कल्पना ने बात पूरी करते हुए कहा। 

          निशा ने करवट बदली और दीवाल से लगी वालक्लॉक पर उसकी नजरें जा टिकी । पिछले सप्ताह दीदी से हुई बात पर उसका ध्यान अनायास चला गया । दीदी ने ही उसे बतलाया था कि इस बार शशांक की यूपीएससी की परीक्षा अच्छी गई है और सेलेक्शन का पूरा चांस है उसका । मन हुआ कि इस बारे में दीदी से अपडेट ले लूँ । उसी समय उनके पापा कमरे में प्रवेश किए ।

          पापा पर नज़र पड़ते ही निशा झटपट बिस्तर पर उठ बैठी। पापा भी उसके बगल में जा बैठे । उसके सिर पर हाथ फेरते हुए बड़ी मायूसी के साथ वे बोले – “बेटा! तुम्हारे लिए एक अच्छा रिश्ता मिला था। तुम्हारे फूफाजी के साथ हम उसे देखने गए हुए थे। परंतु, लगता है यह रिश्ता नहीं हो पाएगा क्योंकि किस्मत हमें धोखा दे गई ।”

          “मतलब, मैं कुछ समझी नहीं पापा?” – निशा ने प्रश्न किया। 

          “बेटा! जिस लड़के को हमलोग देखने गए थे, इसी वर्ष आईएएस की परीक्षा पास कर वह कलेक्टर बना है। लेकिन अफसोस की बात यह है कि यह वही लड़का निकला जिसके साथ शिमला में हमारी कहा-सुनी हुई थी। और उसने हमारे यहाँ रिश्ता करने से साफ इनकार कर दिया।”

          “क्या?” – इस बार निशा सचमुच चौंक पड़ी।

          आगे पापाजी के साथ उस लड़के को लेकर इसी तरह की कुछ ओर बातें हुई। फिर, निराश होकर पापा वहाँ से चले गए। निशा के मन में विचारों का एक भूचाल आ चुका था। शिमला की घटना एकाएक ताज़ा हो गई। उस लड़के द्वारा कही गई हर बात को वह रिमाइंड करने लगी। उस लड़के द्वारा दिखाए जाने वाले अपनत्व के निहितार्थ को समझने की कोशिश करने लगी। उसी समय मम्मी ने उसे फोन थमाते हुए कहा – “लो, कल्पना तुमसे बात करना चाहती है।”  

          फोन कान से लगाते ही उधर से चहकती हुई आवाज सुनाई पड़ी – “कैसी हो निशा?”

          ठीक हूँ, आप कैसी हो दीदी ?” – निशा ने कहा।

          “एकदम बढ़िया, और सुन जिस ख़बर को तुम्हें बतलाने के लिए उतावली हो रही हूँ, सुनकर तुम खुशी से पागल हो जाओगी।” – कल्पना की आवाज में गज़ब का एक्साइटमेंट था।

          “बताओ, फिर तुम्हें भी एक शॉकिंग न्यूज सुनानी है।” - निशा ने कहा।

          “शशांक का रिजल्ट आ गया है और वह आईएएस की परीक्षा पास कर कलेक्टर बन गया। तुम्हारा कलेक्टर बाबू।” – कल्पना ने चहकते हुए ख़बर सुनाई।

          “सच में! गॉड यू आर रिएलि ग्रेट! आई लव यूआई लव यू...आई लव यू शशांक!” – एक्साइटमेंट के मारे निशा एकदम से उछल पड़ी।

          “ज़रा ठहर जा, ठहर जा। सांस तो ले ले। सारा एक्साइटमेंट यहीं गंवा दोगी, शशांक के लिए भी तो कुछ बचा के रख ले।” – कल्पना ने निशा की मनोदशा भाँपते हुए कहा। और फिर वह आगे बोली – “और हाँ, क्या शॉकिंग न्यूज है तुम्हारी ओर से, मैं भी तो सुनूँ जरा।”

          “अरे दी! छोड़ो न अब क्या लेना-देना उससे।” - निशा ने जवाब में कहा।

          फिर कल्पना के कुरेदने के बाद निशा ने शिमला से लेकर पापा द्वारा उस लड़के को देखने और उसके द्वारा शादी से इनकार करने तक का सारा किस्सा एकदम विस्तार से कह सुनाया। निशा की बातें सुनकर कल्पना ज़रा भी नहीं चौंकी; क्योंकि कुछ देर पहले ही शशांक ने उसे सारी बातें कह सुनाई थी। 

          निशा की दास्तां सुनने के बाद कल्पना ने कहा – “तुम्हारी कहानी के बारे में मुझे सबकुछ शशांक ने तुमसे पहले ही बतला दिया है। जिस लड़के के बारे में तुम बात कर रही हो वह कोई ओर नहीं, बल्कि वही शशांक है।” 

          निशा को एक और झटका लगा। शिमला वाला वह लड़का शशांक था। उसे विश्वास की नहीं हो रहा था। परंतु, आखिरकार उसने इस सच्चाई को स्वीकार कर लिया। उसकी खुशी मानो दुगुनी हो गई हो। उसके पाँव अब जमीन पर नहीं मानो हवा में उड़ने लगे हो। वह खुशी के मारे पागल हुए जा रही थी। कल्पना ने उसे आगे शशांक का मेसेज़ सुनाते हुए कहा कि वह भी तुमसे मिलने के लिए उतना ही बेकरार हुए जा रहा है और कल शाम को आठ बजे बिरसा चौक के ‘कैफ़े कॉफी डे’ में तुमसे मिलने के लिए आ रहा है। समय पर वहाँ पहुँच जाना।

          अगले दिन तय समय पर ‘कैफ़े कॉफी डे’ में निशा और शशांक की मुलाक़ात हुई। दोनों एक-दूसरे को देखकर मानो एक-दूसरे पर फ़िदा हो गए। साथ में दोनों ने कॉफी लिया। कुछ प्यारी-प्यारी बातें हुई। दोनों ओर से हाल-ए-दिल बयां हुआ। आखिरकार, कलेक्टर साहब से रहा नहीं गया और घुटनों पर आकर प्यार का इज़हार करते हुए बोले – “आई लव यू निशा! आई लव यू सो मच! आज जो कुछ हूँ सिर्फ़ तुम्हारी प्रेरणा की बदौलत। तुझे मैंने बड़ी शिद्दत से चाहा है और तुझे पाने की जिद्द ने मुझे फ़र्श से अर्श तक पहुँच दिया । सच में मुझे तेरी चाहत यह मुकाम दे गई।” 

          उसी समय शशांक के सारे दोस्त उन्हें घेरकर खड़े हो गए। तालियों की गड़गड़ाहट से कैफ़े गूंज उठा। प्यार के इज़हार का यह दृष्ट शशांक के दोस्तों ने कैमरे में कैद कर लिया।

          कहानी समाप्त हुई। निशा ने किताब बंद की। एक गहरी सांस ली और निकिता को उसकी प्रेम कहानी लिपिबद्ध करने के लिए मन ही मन शुक्रिया कहा।

         

*********

 


द्वारा Govind Pandit
Shared13 Dec 2025
Start 12 Dec 2025
End 12 Dec 2030
इस पर लोग क्या कह रहे हैं
  • बहुत ही सुन्दर, सकारात्मक कहानी। आपकी कहानी लेखन शैली को नमन!🙏🙏🌹🌹🙏🙏