तन जला, मन जला
और ये जीवन जला,
जीवन की इस अंधेरी राह में
मैं चला और तू चला,
खोकर स्वयं के मर्म को
चलने लगा ये सिलसिला,
रह गए अकेले इस डगर में
न मैं मिला न तू मिला,
डूब गये थे इस भंवर में
तो लगने लगा संसार खला,
आरम्भ हुआ था सफर जहाँ
तो अंत क्यूँ कुछ और भला!