सफर(जीवन का)
तन जला, मन जला
और ये जीवन जला,

जीवन की इस अंधेरी राह में
मैं चला और तू चला,

खोकर स्वयं के मर्म को
चलने लगा ये सिलसिला,

रह गए अकेले इस डगर में 
न मैं मिला न तू मिला,

डूब गये थे इस भंवर में 
तो लगने लगा संसार खला,

आरम्भ हुआ था सफर जहाँ 
तो अंत क्यूँ कुछ और भला!



द्वारा Kapil Tiwari
Shared17 Sep 2025
Start 17 Sep 2025
End 17 Sep 2030
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