सृष्टि शृंगार # शब्द सिंधु अंतर्मन 
# स्वतंत्र लेखन-: दिल से

एक पेड मात-पिता के नाम..

मात-पिता का हिय आदर हो, 
एक पेड मात-पिता के नाम हो।।

सींचे जमीं प्रेम, स्नेह नमीं से,
सहेजे अतिशय संयम, ध्यान से।।

हाथों में जैसे नवजात नवांकुर हो, 
संरक्षित रहे हर पौध, नेह छाँव हो।।

जल, वायु, रवि रश्मियों का साथ रहें,
निरंतर विकास पथ पौध बढती रहे।।

खिले-खिले हरियाले वन जंगल मनहर, 
सृष्टि रमणी शृंगार, रूप मोहक सुंदर।।

प्रकृति गोद में मिले हिलोर हितकारी,
परम प्रभु रचना मानव, हो उपकारी।।

स्वरचित मौलिक रचना 
चंचल जैन
मुंबई, महाराष्ट्र
इस पर लोग क्या कह रहे हैं
  • बहुत खूब वीणा जी! पुरानी स्मृतियों में आँसू और मुस्कान का इंद्रधनुषी जलवा नज़र आता हैं।