एक वही चीज तो है, जो मेरे दिल के बहुत करीब है। आज तक बहुत से किस्से सुनें वरन महसूस करे। इस एक बात से हमें एक बात जरूर समझ आती है कि कुर्सी की अहमियत और ताकत हमारे लिए क्या मायने रखती है।
राजेश जो कि एक सीधा- साधा, मेहनती और पढ़ाकू लड़का रहा है। उसके इस सरल स्वभाव के कारण ही सब उसकी ओर फौरन आकर्षित हो जाते। लेकिन उसकी एक कमी जो उसे बार - बार अंदर से कचोटती कि वह अपनी दोस्ती लंबे समय तक नहीं बढ़ा पाता।
जैसे- जैसे साल गुजरने लगे, उसके दोस्त भी बदलने लगे। इन दोस्तों में उसे अबतक ऐसा नहीं मिल पाया जिसके साथ वह अपने मन की बात खुलकर कह सकें। स्कूल के समय तो वह सबसे हंसी- मजाक, रूठना- मनाना तो कभी कभी मारपीट भी कर लेता किंतु जैसे उसने अपना बचपन का गाँव छोड़ा तो वह एकदम अकेला- सा हो गया। ना किसी से ज्यादा बातें कर सकता था न किसी के पास ज्यादा ठहर सकता, इस तरह के बदलते व्यवहार के कारण वह दोस्तों के बीच हंसी का पात्र बना रहता जिससे वह स्वाभाविक तौर पर नाखुश होता और चुपचाप अकेले बैठे रहता।
उसके इस व्यवहार को जानकर ही एक दिन अध्यापक जी ने उसको किताबों से जुड़ने की सलाह दी। राजेश पढ़ाकू तो था ही बस उसे क्या करना चाहिए या क्या नहीं ? इन बीतें कुछ सालों से समझ नहीं आ रहा था। अपने अध्यापक जी के सुझाव से जो रास्ता उसे प्राप्त हुआ, वो सिर्फ वही जानता है जिसका शुक्रगुजार वह हमेशा रहेगा।
पूरे छह सालों बाद अपनी मेहनत और प्रबल इच्छाशक्ति के कारण वह आज कलेक्टर बन पाया। शुरुआती दिनों में पढ़ाई से लगाव, बीच में अकेले होने का एहसास और फिर गुरु की शिक्षा के कारण वह आज कुर्सी की कीमत भलीभाँति जान चुका है। उसके इस बदलते रूप को देखकर उसके परिजन, मित्र तथा बहुत से जाननेवाले अचंभित से उसकी ओर देखते है।
जब कभी कोई उसके बड़े - से बंगले की ओर से गुजरता है तो उन्हें उसके बंगले के पास एक पुरानी - सी एक कुर्सी दिखाई देती है। कई लोग पूछते है कि " आप इतने बड़े आदमी हो और आप यह पुरानी कुर्सी संभाल रहे हो? " इसका जवाब कहते हुए राजेश मुस्कुराता हुआ कहता है, " यह एक खास कुर्सी है, जो मुझे मेरे अध्यापक जी ने महाविद्यालय में पढ़ते वक्त दी थी और उसके साथ साथ यह किताब जिसके कारण ही मैं इतना बड़ा आदमी बन पाया हूँ और मेरी यह अंतिम इच्छा है कि मेरी अंतिम साँस इसी किताब को पढ़ते हुए और इसी कुर्सी पर आयें। जिसके कारण मेरा यह जन्म धन्य हो पाया है।