बसंत!
खेत-खलिहानों में लहरायें थान ,
पवन छेड रही वीणा पर मधुर तान!
बिछी है धरा पें गेरूआ कालीन,
कहकहें लगायें धरती फेंक वस्त्र मलीन!

बहारों ने दी हौले हौले दस्तक,
सूरजमुखी उठायें सूरज की ओर  मस्तक!
प्रकृति हुई देखो नतमस्तक,
रंगबिरंगी फूलों ने भरी हामी झुका मस्तक!

हरियाली चादर पर लाल फूलों की नक्काशी,
नील गगन में कलरव करते खग गण बृजवासी!
घूम-घूम आएं प्रवासी परिंदे मथुरा, काशी!
सावरियां के होठों को चूमे बांसुरी प्रीत-प्यासी!

बसंत के आगमन से खिलखिलायें  कानन-कानन!
भौरों से दो-चार हुयें पंखुड़ियों के सजल नयन!
सौरभ से पुलकित हुई यौवना, रूपसी वसुंधरा, 
अंग-अंग पुलकित, बिखरी फ़िजा में अमिधारा!

एक ओर प्रकृति का सुन्दर रूप, दूसरी ओर चेहरा कुरूप!
बहारों के मौसम में पतझड़ से बुजुर्ग असहाय, विद्रुप!
खिलखिलाते उपवन में रिक्त कंक्रीट के खाली बेंच!
धुंधली नज़र के बीच लड़खड़ाते सम्मान की रस्सीखेंच!

स्वरचित तथा मौलिक,
द्वारा कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई |
इस पर लोग क्या कह रहे हैं