अंजनेय छंद आधारित रचना

नमन मा शारदे 🙏🙏
अरुण छंद, गीत 
सादर समीक्षार्थ!

विघ्न का , दम्भ का,  अन्त  खल   राज  का।
होलिका, नित दहन, सच अटल आज का।।

चल-अचल, वस्तु  का, मोल  है  भोग  से।
हो   दवा, या   दुआ , मुक्ति   दे    रोग    से।।
राजसी,  थाट    की,     चाहतें    हैं   बड़ी  ।
खोखली,  नीव पर,  कोठियाँ   हैं    खड़ी।।

रूप का,   मोह  का, मद  नहीं   काज  का।
होलिका, नित दहन, सच अटल आज का।।

लोभ   में , क्रोध   में,   मानवी   क्यों अड़ा।
अब  भरा,  तब  भरा, पाप   का  है  घड़ा।।
बिन नियम,  हाल क्या,  देख  लो देश का।
नृप असल ,  काम    है ,  न्याय    परिवेश   का ।।

ध्यान    हो, भान   हो,    राष्ट्र   के   साज  का।।
होलिका, नित दहन, सच अटल आज का।।

हम करें, अनुसरण, अति सहज  रीत का।
रात्र  हो, काल  की, सुर  अधर  जीत   का।।
हो  नमन,  मातृ  भू,  तन  सुमन    वार    दूँ।
कर विकल, अरि सकल,  यह जगत  तार दूँ।।

मातृ  भू  , भारती,   तेज     हूँ    ताज     का।
होलिका, नित दहन, सच अटल आज का।।

स्वरचित तथा मौलिक,

कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।

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