भगवान जी!
दादी से मेरी कट्टी है!
आप से मेरी बट्टी है!
वो कहती है,
मुन्ना! तू कान्हा का रूप है!'
झूठ मूठ बहलाती है...
सर्दियों में भी,
ठंडे पानी से नहलाती है!
पल्लू से पोंछ कर...
फटे कपड़े पहनाती है!
और कहती है,
मुन्ना! तू कान्हा का रूप है!'
झूठ मूठ मुस्कुराती है...
लकड़ियां जलाकर,
मिट्टी की हांडी चढ़ाती है!
उबले पानी में राब पकाकर,
सारी मुझे खिलाती है!
और कहती है,
मुन्ना! तू कान्हा का रूप है!'
झूठ मूठ भरमाती है...
मिलों चलकर,
पानी की मटकी भर लाती है,
कुछ गौरैया को रखकर,
बाकी मुझे पिलाती है!
और कहती है...
मुन्ना! तू कान्हा का रूप है!'
झूठ मूठ सुस्ताती है...
फटी चटाई बिछाकर,
गोदी में ले लोरियां सुनाती है!
परियों की कहानी से,
अक्सर मुझे रिझाती है!
और कहती है...
मुन्ना! तू कान्हा का रूप है!'
भगवान जी!
दादी से मेरी कट्टी है!
आप से मेरी बट्टी है!
सच बताना भगवान जी...
मोर मुकुट, गले मोतियन माला,
रेशमी पीताम्बर, गोकुल ग्वाला !हीरेजड़ित सिंहासन, सेज़ रेशमी,
द्वारकाधीश वो, महल निवासी!
छप्पन भोग खाये कान्हां बृजवासी!
सच बताना भगवान जी...
झूठी है न मेरी दादी?
दादी से मेरी कट्टी है!
आप से मेरी बट्टी है!
द्वारा कुसुम सुराणा!