शीर्षक : जीवन....
जीवन कठपुतलियों का मेला है,
मन भीड़ में भी नितांत अकेला है!
रंगमंच पर रंगकर्मियों का रेला हैं,
प्रस्तुतियों की निर्बाध श्रुन्खला है!
जन्म-मृत्यु पहेली, दैवीय प्रयोगशाला है,
विधाता की ज्ञानदायिनी प्रशाला है!
जीवन सागर का निरन्तर स्पन्दन है!
ज्वार-भाटा में शशिधर अभिनन्दन है!
सूरज से लुका-छुपी खेलना छन्द है,
पूर्णमासी चन्द्रमा की आभा मन्द है!
जलपोतों का बन्दरगाह पे मेला है,
लहरों पे चढ़ किनारे छूना खेला है!
जीवन श्यामल-धवल-खग मेला है,
धरती-अम्बर का मिलन अलबेला है!
धरती ने सूरज की तपन को झेला है,
वृक्ष-वल्ली-जीव-जन्तु-जल रेला हैं!
जियो और जीने दो जीवन-आधार है,
पञ्चमहाभूतों से ही जीवन संचार है!