माँ! रुण झुण, रुण झुण करती मैया, आओ जी।
भक्तों के जीवन में खुशियाँ, लाओ जी।
महिषासुर संहारक दर्शन, ध्याओ जी।
लूर-लूर जाता अमिजल घट, पाओ जी।।

ममता की माँ शीतल छाया, पाई है।
दीन-दुखी पर तेरी माया, स्थाई है।
नित्य सबेरे माँ की महिमा, गाई है।
कुशल सकल जग हितकारी तू, माई है।।

अष्टभुजा माँ खल संहारक, हे माता।
तेरी कृपा दृष्टि बिन कैसे, हो साता।
सुन्दर मुख अनुपम आभा में, खो जाता।
बैठ किनारे कैसे मोती, मैं पाता।।

जग उजियारा करती आई, मैया है।
भक्तों के मानस पर छाई, मैया है।
चंचल लक्ष्मी किरपा लाई, मैया है।
जग हित कारण करत लड़ाई, मैया है।।

स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।



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