सावन मन भावन...
सावन यह मन भावन पावन,
तन मन सहज भिगोता है।
बरसे अंबर से जब पानी,
कृषक खेत को जोता है।१।
रिमझिम रिमझिम कभी जोर से,
सलिल धरा पे झरता है।
गरजते काले मेघ गगन में
शोर बहुत वो करता है।२।
खुश होते है लोग बाग सब,
मौज मस्ती छा जाती है।
झूले डल जाते आंगन में,
बहन बेटियां आती है।३।
बहते जल धारे नदियों में,
मंगल मंगल होता है।
फसलें सब उगने लगती है,
जो जो किस्में बोता है।४।
मूंग अरहर मोठ बाजरा,
बोये अक्सर जाते है।।
विशाल देश के भू भाग वो,
हरे हो लहलहाते है।५।
स्वरचित:अशोक दोशी