भावांजलि... कुण्डलिया छंद आधारित रचना ।

रतनजड़ित हैं यामिनी, पुलकित होगी भोर।।
मौन हुई स्वर स्वामिनी, चली मोक्ष की ऒर।
चली मोक्ष की ऒर, छोड़ जग में अँधियारा।
चली चिरंतन देश, छोड़ अब वतन हमारा।
मातु भारती शान, बहुत है तेज नभतड़ित।
गूँज उठा है नित्य, साज अनुपम रतनजड़ित।।

भाषा स्वर की साधना, जोश अपरिमित नेह।
राग-रागिनी साधिका, सप्त सुरों से स्नेह।
सप्त सुरों से स्नेह , विविध थी गायन शैली।
जीवन पर्यंत यार, सतत जग किरत फैली।
लोक गीत भण्डार, जगत मधुरिम अभिलाषा।
हर दिल की पहचान, ह्रदय की सुन्दर भाषा।।

आशा सुन्दर रागिणी, नाद ब्रह्म में लीन।
सपनों में तल्लीन थी, देख रही थी मीन।
देख रही थी मीन, चंचला अनुपम गंगा।
बेटी भारत की सदा,खड़ी थी थाम तिरंगा।
बचपन-यौवन भूल, पलट दे विपदा-पासा। 
सागर के बिच खड़ी, हँसी में चहकी आशा ।।

स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।


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