झुकी-झुकी पेड़ों की डालियाँ,
मोतियों सी धान की बालियाँ,
लदी-लदी सूरजमुखी की टहनियाँ,
खिली-खिली गुलाब की पंखुडियाँ,
सृष्टी को दिलों-जाँ से जता रही हैं प्यार.....
अच्छा लगता है।
सुध-बुध खो चूका पूर्णमासी चन्द्रमा,
विरह-अगन में जल रही प्रियतमा,
निरंतर साहिल को चूमती मनोरमा,
लहरों में खोई अनुरागिणी अनुपमा,
तहे दिल से प्रकृति को जता रही हैं प्यार.....
अच्छा लगता है।
जेठ में आग उगलता पलाश,
शिशिर में चाँदनी में नहाता आकाश,
सावन में नववधु की पीहर की आस,
बसंत में फूलों का सौंदर्य-विलास,
दिल से रच्चणहारे को जता रही हैं प्यार.....
अच्छा लगता है।
पर्वतमालाएँ चूमती चंचल हवाएँ,
उन्मत्त बहती नदियोंकी धाराएँ,
सूरज को अर्ध्य देती रूपसी ललनाएँ,
बूँद-बूँद बरसती कजरारी घटाएँ,
दिल खोल जलधारा को जता रही हैं प्यार.....
अच्छा लगता है।
मगर
जननी-कुक्षी में पल रहा मासूम,
माँ के दूध से हो रहा मरहूम!
स्तनपान कराती माँ का 'फिगर',
शोडषि को रास नहीं आया...
माँ के आँचल से दूर...
बच्चे की आया जता रही हैं प्यार.....
क्या अच्छा लगता है?
गिरधर के प्यार में दीवानी है मीरा,
कोयले की खदान से ढूँढा है हीरा!
रूहानी प्यार समझ न पाई दुनिया,
आत्मा-परमात्मा का मिलन मीरा को भाया!
दे जहर का प्याला.... देख परब्रह्म...
दुनिया! जता रही हैं प्यार.....
क्या अच्छा लगता है?
कारे-कारे नयन में सजे हैं सपने,
पलकों की कोरों में छुपे हैं अपने!
बुलंद हौसलों ने दी चट्टानों को चुनौती,
बिना स्नेह दिए में जले नहीं ज्योति!
शोहरत के शिखर पर ... स्वार्थवश
दुनिया जता रही हैं प्यार.....
क्या अच्छा लगता है?
बेशक ......
अपनों की प्यार भरी बात,
प्रकृति माँ का ममतामई साथ
परमपिता का माथे पर हाथ.
बुजुर्गों का दुलार, विश्वास,
जिंदगी से बेतहाशा प्यार जताना... अच्छा लगता है!
स्वरचित तथा मौलिक,
द्वारा कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई, महाराष्ट्र!