उजालों का प्रण लिए, रात भर जलता रहा दीया,
स्नेह रीता-रीता, झेलता रहा दुनिया की दुश्वारियां!
आँधियों से अकेला, लड़ता-झगड़ता रहा, उम्र भर,
दीये तले तम के सायें ता-ता थैया कर कहे सब्र कर!
लौ फड़फड़ा कर ढूंढती रही अपना उत्तराधिकारी!
दीये से दीया जला, बाती धुँआ-धुँआ, गम की मारी!
दीयें हमारे अभिभावक, समर्पण-त्याग, स्नेह-बाती,
ज़िन्दगी भर जलते रहें, देने हमें रोशनी की थाती!
सूर्य से आँखें मिला भरते रहें बच्चों का अक्षय पात्र,
खून-पसीना एक कर पोषित करते रहें बच्चों के गात्र!
क्या जला सकें हम मन-मन्दिर में अखंड दीप कृतज्ञता के?
अर्पित कर पाएं कमल-कुसुम चरणों में माता-पिता के?
स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई, महाराष्ट्र|