ये प्यार ही तो ज़िन्दगी भाग ९
भाग ९

'वेलकम टू होम... यंग मैन' कह कर वैदेही ने खिलखिला कर वज्र के हाथ में बुके थमा दिया! वज्र ने उसे हौले से गले लगाया... माँ ने उसकी आरती उतारी और दीए की लौ को हवा के झोकों से बचाते-बचाते तुलसी वृन्दावन में रख दिया। आबा गाड़ी से सामान उतरवा रहे थे... वैदेही वज्र को उसके कमरे में ले गई! कमरे की साज-सज्जा देख वज्र फूले नहीं समाया। वह समझ गया यह वैदेही के कोमल हाथों के स्पर्श का कमाल है! कितनी बारीकी से सजाया था उसने कमरा! एक-एक चीज में उसका अस्तित्व मुखर हो कर बोल रहा था! कमरें की दरों-दीवारों से उसके कुशल-मंगल के स्वर गूंज रहें थे। 
आखिर एक स्त्री के बिना घर की रौनक में चार चाँद लगेंगे भी तो कैसे? छोटीसी दुनिया होती है एक स्त्री की... उसका अपना घर.. उसके जर्रे-जर्रे में वह समाई होती है! अपने रंगबिरंगी सपनों से सजाती-संवारती है उसे, प्यार से चमकाती है उसकी दरों-दीवारों को...तन-मन-धन लगा देती है उसे लाजवाब, यादगार बनाने में और वह ज़िन्दगी भर तलाशती रहती हैं अपना घर!
सिर्फ अस्पताल से घर तक आने में वज्र थक गया था! उसकी धड़कने तेज हो गई थी तभी आबा आए... "पोरा! बरं वाटतयं न आता.. वैदेही! आज दोघींनी इथचं जेवायचं बरं का.." और वह रसोई की तरफ चले गए! 
वज्र की दवाईयाँ, पीने के पानी की बोतल वैदेही ने पास के टेबल पर रखवा दी थी! गुलदस्ते को रखने के लिए वज्र ने एक पानी से भरा फूलदान मंगवाया था ! सभी को सॅनिटाइज कर दिया गया था! गुलदस्ते में सजे फूलों की मंद-मंद सुगन्ध वातावरण को उल्हास और उमंग से भर रही थी! 
वज्र की माँ ज्यादातर गाँव में ही रहती थी... पुणे के पास ही सासवड़ उनका गांव है! वहाँ सौ एकड़ में फैले उनके पुश्तेनी खेत-खलियान, अमरुद और अंगूर के बाग..
उन सबको सँभालना, खेत मजदूरों से काम करा कर लेना, फलों के निर्यात के लिए पैकिंग करा कर लेना सब आसान काम नहीं था... वज्र का ननिहाल भी वहीं था... माँ वहाँ सब संभाल लेती और आबा यहाँ मुम्बई का एक्सपोर्ट का कामकाज! वज्र के बूढ़े दादा-दादी भी वहीं गाँव में ही थे! उम्र की ढलान पर शारीरिक और मानसिक परेशानियाँ तो होती ही हैं! माँ पहले से संयुक्त परिवार में पली-बढ़ी और ब्याही भी गई...बड़े घर में.. नौकर-चाकर, सगे-सम्बन्धी, तीज-त्यौहार सभी वह संभाल लेती थी! दादा-दादी भी अपने तरीके से हाथ बंटाते थे! 
गाँव में उनका सिक्का चलता था! आधी रात को भी, किसी की भी मदद को तैयार इस परिवार के बुजुर्ग को लोग 'देव माणूस' ही कहते थे! छोटा सा गाँव था लेकिन सभी एक-दूसरे की मदद के लिए तत्पर रहते थे! 
कितनी अजीब सी बात हैं न... जहाँ संसाधनों, सुविधाओं तथा पैसे की कमी थी, घर छोटे थे, वहाँ लोगों के दिल बड़े थे.. कोई अजनबी भी उसमें समा जाता था मगर इन कंक्रीट के जंगलों में, संसाधन, पैसा, सुविधा ज्यादा होने के बावजूद भी लोग कितने तंगदिल हैं न ... इंसानियत यहाँ दर-दर की ठोकरें खाती नज़र आती है... पल-पल!
वैदेही की नानी उनकी पडोसी थी! माँ का उनके यहाँ आना-जाना लगा रहता! आबा ने भी अपने खानदान की थाती को बड़े जतन से संभाल रक्खा था... शायद जिनका दिल साफ होता हैं उस पर ऊपरवाला भी मेहरबान होता है।
वज्र के लिए अलग से भोजन बना था.. न ज्यादा तीखा न ज्यादा कड़क...धनतेरस की खुशी में घर में ही मिठाई बनाई गई थी सूखा मेवा डालकर गेहूँ के आटे का हलवा! वैदेही भोजन की थाली लेकर आई....वज्र हलवे को देख कर आनंदित हो गया..उसने झट से खाना शुरू किया...वैदेही पास की कुर्सी पर बैठ कर उसे अपलक निहार रही थी... कितना मासूम है यह! आज भी उसके अंदर का बच्चा जिन्दा है, शिव जी के बटुक रूप में! हलवे के दो-तीन कौर खाएं और उसे अचानक वैदेही की याद आई।
"कितना बेवकूफ हूँ मैं... वैदेही को तो हलवे के लिए पूछा ही नहीं... " वैदेही! सॉरी...घे न.. जास्त गोड़ नाही ग! " तुम्हारे लिए दूसरी प्लेट में मंगवाऊ?... उसका जवाब देने के बजाय वैदेही ने अपना मुँह खोला..मानों मन ही मन कह रही हो...हो सकता है इस दो-चार चम्मच हलवे की मिठास उनके उर्वरीत जीवन में मिठास घोल दे!
दोनों एक-दूजे की आँखों में आँखें डाल कुछ सवालों के जवाब ढूंढ़ रहें थे... तभी वैदेही की मम्मी ने आवाज़ दी.. "वैदेही... वज्र ला का ही पाहिजे का?"
वज्र ने बहुत दिनों बाद आज भरपेट आहार लिया और वैदेही की ऒर मुस्कुरा कर देखा... मानों पूछ रहा हो... तेरा तो पेट ऐसे ही भर गया न ? तभी आबा आए और उन्होंने वैदेही को डायनिंग हॉल में भेजा! सुरुचि भोजन कर, त्यौहार की शुभकामनायें दे कर, माँ-बेटी सब से स्नेहिल विदा लेकर घर की ऒर निकल पड़ी....
आबा फाटक तक पहुँचाने आएं और जबरदस्ती माँ के हाथ में हलवे का डब्बा थमा दिया! यादों का पुलिन्दा लेकर,आनंदित हो कर वह घर की ऒर लौट चुकी थी।

माँ ने आज सुबह जल्दी उठ कर ही आँगन बुहार दिया था और पानी की फुहारों से मिट्टी को भीगो दिया था! मिट्टी की सौंन्धी-सौंन्धी खुशबू से फ़िजा महक रही थी। कितना भी काम क्यों न हो वह पौधों को पानी देना कभी नहीं भूलती थी! उसे बड़े-बड़े पेड़ों की कम, नन्हें-नन्हें पौधों की ज्यादा चिंता लगी रहती थी। कहीं भी जाने से पहले खिड़कियां बंद करना, दूध को फ्रीज में रखना, गैस - गीजर चेक करना वह नहीं भूलती थी। घर की सीढ़ी पर एक कटोरे में 'मनी म्याऊ' के लिए दूध रखना उसकी आदत बन गई थी। फाटक की किर्र-किर्र सुनते सफ़ेद बिल्ली न जानें कहाँ से दौड़ कर आती और दोनों के पुचकारे बिना उन्हें दरवाज़े से अंदर न जाने देती! 
कितना निर्मल होता है इन पालतू जीवों का प्यार.. एक कटोरा दूध पीला दिया, एक-दो बार रोटी खिला दी...बस! जिंदगी भर नहीं भूलते यें जीव.. मगर हम इंसान....? कितनी आसानी से भूल जाते हैं बुरे वक़्त के संगाती को! स्वार्थ की परतें आँखों पर चढ़ते ही अपने परायों से नज़र आने लगते हैं इंसान को। यहवार ने सोचने समझने की क्षमता हमें दी लेकिन हमने उसका उपयोग किया हमारे स्वार्थ के लिए! 

प्रकृति से कितना कुछ सीखना चाहियें हमें... कितनी समय की पाबंद होती है वह! कितना अनुशासन, जीवट है प्रकृति में! प्रकृति से बड़ा न कोई धर्म है न कोई गुरु।

स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई, महाराष्ट्र|
अगला भाग अगले अंक में...


इस पर लोग क्या कह रहे हैं